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थिम्पू की सुबह एवं परिकल्पना सम्मान समारोह - भूटान यात्रा -5

पौ फ़टते ही आँखे खुल गई, बालकनी से देखा तो आस-पास अंधेरा सा ही था, पर दूर पहाड़ की बर्फ़ जमी चोटी रश्मि स्नान कर रही थी। सूर्य की किरणें धवल बर्फ़ पर पड़ने के कारण स्वर्णाभा का दृश्य उत्पन्न कर रही थी। द्वार उन्मुक्त कर बाहर निकला तो ठिठुरा देने वाली ठंड थी। कैमरा विश्राम मोड में होने के कारण इस दृश्य को संजो नहीं सका। सिर्फ़ आंखो के द्वारा हृदय में ही उतार पाया। मोबाईल कैमरे से दो-चार चित्र लिए और भीतर आ गया। तभी द्वार पर दस्तक हुई और चाय वाला भी पहुंच गए। गर्मागर्म चाय की भाप से सिकती हुई अंतड़ियों को राहत मिली। कमरे से बाहर निकलने का जी नहीं कर रहा था।
खिड़की से पर्वत दर्शन
हम मैदानी इलाकों के रहने वालों के नित्य स्नान जरुरी है, स्नान के साथ ही दिनचर्या प्रारंभ होती है। स्नानाबाद ही लगता है कि आज फ़िर नया दिन निकला है, वरना दिन पुराना ही रहता है। रात की खुमारी भी नहीं उतरती। पता नहीं यहाँ के लोग कितने दिनों में स्नान करते होगें या फ़िर काग स्नान से ही काम चला लेते होगें। बाथरुम में न बाल्टी थी न मग्गा। पर छ: फ़ुटा बाथटब जरुर था। नल से गर्म पानी आना शुरु हो गया। आज बाथटब स्नान ही किया जाए। बाथटब लबालब भरने के बाद उसमें उतर गए और गर्म पानी से देह से भरपूर सिंकाई की। आनंद आ गया। अभी तक फ़िल्मों में नायिकाओं को बाथटब स्नान करते देखा था। आज हम खुद ही बाथटब में थे। पर कोई फ़ोटो लेने वाला नहीं था। एक बारगी तो फ़ोटो की कमी खली। :) फ़ोटो नहीं हुई वरना 6 पैक और 8 पैक सब दिख जाते।
सुबह की धूप का आनंद - ललित शर्मा, गिरीश पंकज, कृष्ण कुमार यादव एवं समर बहादुर वर्मा
तैयार होकर लॉबी में पहुंचे तो सूनीता हांफ़ते हुए आ रही थी, जैसे 10-20 किलोमीटर की मैराथन दौड़ कर आ रही हो। बोलने के लिए मुंह खोलती तो शब्द भी जम रहे थे और उष्मा पाकर अटक-अटक पर पिघल कर बाहर निकल रहे थे। जमें हुए शब्द जब हम तक पहुंचे तो पता चला कि मोहतरमा मार्निंग वॉक करके आ रही हैं। फ़िर पता चला कि इनकी हार्दिक इच्छा यहाँ बाईक चलाने की है। बाईक तो मुझे कहीं दिखाई नहीं दी पर इन्होने कहा कि "मैं इंतजाम करती हूँ।" पता नहीं किसको बाईक के लिए कह कर आई और वह बाईक 3 दिनों में कहीं नजर नहीं आई। न ही बाईक की सवारी हुई। इनकी इच्छा अधूरी रह गई। 
यही चिमनी है लोखन वाली
टैरेस पर धूप आ गई, साथ ही यहाँ एक लोखन की चिमनी वाली सिगड़ी भी सुलग रही थी। जब मैं टैरेस पर पहुंचा तो कोई सज्जन नहीं आए थे। सिगड़ी में थोड़ी देर हाथ सेंक कर दस्ताने धारण कर लिए। हाथों का बचाव तो हो गया पर नाक और कान को ठंड लग रही थी। कान बंद करो तो सुनाई नहीं देगा और नाक बंद करो तो हरे राम, हे! राम हो जाएगा। तभी सर्जना शर्मा जी का पदार्पण हुआ। वे स्नानोपरांत ध्यान मोड में थी। ऐसे लग रहा था कि अनुलोम विलोम करते हुए ही चल रही हैं। उन्होने एक सोफ़े पर आसन जमा लिया और सूर्यमुखी होकर अनुलोम विलोम प्रारंभ कर दिया। स्वास-प्रस्वास की प्रक्रिया शरीर की ऊष्मा बनाए रखती है। जैविक हीटर शरीर की रक्षा के अनुसार ऊष्मा का उत्सर्जन प्रारंभ कर देता है।
योगाचार्या सर्जना शर्मा जी
यहाँ सुबह की धूप कुछ अजीब ही तरह की चमकीली होती है और आंखों को चुभती है। गर्मी के मौसम में जिस तरह चिलचिलाती धूप पड़ती है, कुछ उस तरह की ही धूप थी। सूर्य की ऊष्मा भी ठंड को कम नहीं कर पा रही थी। यह तो प्रकृति की महान कृपा हम थी कि हवा नहीं चल रही थी। अगर हवा चलती तो कहर ढा देती। दस्ताने हाथ से बाहर निकालते ही अंगुलियाँ गायब हो जाती थी। नाश्ता भी लग चुका था, हमसे तो यहाँ का खाना ही नहीं खाया जा रहा था। पानी भी बहुत कम पीया जा रहा था। ठंडा पानी पीयो तो दांत कनकनाने लगते और गर्म पानी गले से नीचे नहीं उतरता। अजीब संकट में फ़ंस गए थे और इसका कोई हल भी नहीं था। 
ब्लॉग़ भांति भांति के
सुबह से ही मनोज पाण्डे जी ने आज के कार्यक्रम की लिस्ट एवं आवश्यक वस्तुओं के साथ एक फ़ोल्डर रुम में ही सबको थमा दिया। आज रिसोर्ट के मिटिंग हॉल में मुख्य कार्यक्रम था। थोड़ी देर में सभी दूल्हे की माफ़िक सजधजकर रुम से बाहर निकलने लगे। लगा कि फ़ैंसी शो जैसा ही कार्यक्रम होने वाला है। डॉ विनय दास जी ने पूर्ण भारतीय परिधान धारण कर लिया था। कटिवस्त्रम, अंगवस्त्रम, जैकेटम के साथ उत्तरीयम धारण कर भूटान की धरती पर पारम्परिक भारतीय परिधान गरिमामय दर्शन भूटानवासियों को करवाया। बाकी तो सभी कोट पैंट में ही थे। 
कार्यक्रम में सिरपुर की कहानी
आज के कार्यक्रम के अतिथि भूटान चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के महासचिव फूब शृंग, उप महासचिव चन्द्र क्षेत्री, सार्क समिति के महिला विंग तथा इन्टरनेशनल स्कूल ऑफ भूटान की अध्यक्षा थिनले ल्हामा का उपस्थित होना भी तय हो गया। कार्यक्रम 11 बजे प्रारंभ हुआ। अतिथियों के साथ डॉ नित्यानंद पाण्डे, गिरीश पंकज, कृष्ण कुमार यादव एवं रविन्द्र प्रभात मंचासीन हुए और कार्यक्रम संचालन की डोर सुनीता यादव ने थाम ली। एकदम झकास भारतीय अंग्रेजी में कार्यक्रम का संचालन प्रारंभ हुआ। वैसे भूटान के बड़े छोटे अधिकारी हिन्दी समझते और बोलते हैं क्योंकि इनका काम भी हिन्दी के बिना नहीं चलता। पर इन्हें अंग्रेजी की सुविधा हमारे मंच से विशेष तौर पर प्रदान की गई।
सिरपुर सैलानी की नजर से भेंट
मंच के समक्ष ही समस्त सम्मानाधिकारी बैठे हुए थे और सभी के मोबाईल में कैमरे भी थे। नाम की पुकार होते ही सभी अपने मोबाईल फ़ोन लेकर सामने ही डट गए, अब पीछे बैठने वालों को कुछ दिखाई दे या न दे, उनकी बला से। वैसे भी जब से मोबाईल में कैमरे का चलन प्रारंभ हुआ है, लगभग सभी समारोहों में कमोबेश यही स्थिति रहती है। हायर किया गया फ़ोटोग्राफ़र पीछे रह जाता है और मोबाईल फ़ोटोग्राफ़र मुंह में भी कैमरा डाल कर फ़ोटो ले लेते हैं। फ़ेसबुक, वाट्सअप फ़ोबिया जो कराए वो कम है। 
मंचासीन अतिथिगण
ब्लॉगर सम्मेलन में परिकल्पना सम्मानों का वितरण किया गया। कृष्ण कुमार यादव को सर्वोच्च सार्क शिखर सम्मान, डॉ. राम बहादुर मिश्र को साहित्य भूषण सम्मान, रणधीर सिंह सुमन व डॉ. विनय दास को क्रमशः सोशल मीडिया सम्मान और कथा सम्मान, कुसुम वर्मा को लोक-संस्कृति सम्मान, डॉ. अशोक गुलशन को हिन्दी गौरव सम्मान, सूर्य प्रसाद शर्मा को साहित्य सम्मान तथा ओम प्रकाश जयंत व विष्णु कुमार शर्मा को क्रमशः साहित्यश्री सम्मान व सृजनश्री सम्मान, विश्वंभरनाथ अवस्थी को नागरिक सम्मान प्रदान किए गए।
श्री फ़ूब शृंग एवं ब्लॉगर
इस ब्लॉगर सम्मेलन में परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान से श्री कृष्ण कुमार यादव, श्री ललित शर्मा एवं श्रीमती सम्पत मोररका को सम्मानित किया गया। स्मृति चिन्ह एवं उत्तरीय के साथ 25 हजार की राशि भी देने की घोषणा की गई। इसके अलावा डॉ. राम बहादुर मिश्र को साहित्य भूषण सम्मान, रणधीर सिंह सुमन व डॉ. विनय दास को क्रमशः सोशल मीडिया सम्मान और कथा सम्मान, कुसुम वर्मा को लोक-संस्कृति सम्मान, डॉ. अशोक गुलशन को हिन्दी गौरव सम्मान, सूर्य प्रसाद शर्मा को साहित्य सम्मान तथा ओम प्रकाश जयंत व विष्णु कुमार शर्मा को क्रमशः साहित्यश्री सम्मान व सृजनश्री सम्मान, विश्वंभरनाथ अवस्थी,  सुनीता प्रेम यादव, प्रकाश हिन्दुस्तानी,  गिरीश पंकज, अल्पना देशपांडे, अदिति देशपांडे, सर्जना शर्मा, निशा सिंह, आलोक भारद्वाज आदि को भी विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान के लिए परिकल्पना सम्मान से नवाज़ा गया।
परिकल्पना का परचम थिम्पू में लहराया
सम्मेलन में पाँच पुस्तकों - संपत देवी मुरारका की यात्रा वृत्त, कुसुम वर्मा की ह्रदय कँवल, सूर्य प्रसाद शर्मा निशिहर की संघर्षों का खेल, विष्णु कुमार शर्मा की दोहावली, अशोक गुलशन की क्या कहूँ किससे कहूँ और परिकल्पना समय पत्रिका के जनवरी अंक, परिकल्पना कोष वेबसाईट का लोकार्पण भी किया गया । इसके अलावा अल्पना देशपांडे की कलाकृतियों की प्रदर्शनी व कुसुम वर्मा के लोकगीत गायन का उपस्थित सभी जनों ने आनंद लिया एवं प्रशंसा की । मुख्यातिथि ने अपने भाषण में भूटान एवं भारत की सांस्कृति विरासत एवं चल रहे साझे कार्यक्रमों की जानकारी दी। साथ उपस्थित भारतीयों को भूटान राष्ट्र के विषय में मुख्य जानकारी भी अवगत कराया। भोजनावकाश तक समारोह समपन्न हो गया। कुल मिलाकर मामला आनंददायक ही रहा।

भूटानी मुद्रा और टॉकिन : भूटान यात्रा 4

भूटान की मार्केट में भारतीय मुद्रा उसी तरह स्वीकार की जाती है जिस तरह भारत में। परन्तु वे भारतीय मुद्रा रुपए के बड़े नोट लेकर भूटानी (नोगंत्रोम) मुद्रा वापस करते हैं। भूटानी नोटों का काजग अच्छा है, नेपाली मुद्रा जैसे गंदे नोट नहीं है। नेपाल के नोट तो जेब में रखने की इच्छा ही नहीं होती। वैसे भी नेपाल में भारत के 500 एवं 1000 के बड़े नोट प्रतिबंधित हैं। परन्तु भूटान में ऐसा नहीं है। वैसे मुद्रा का यह खेल ध्यान देने योग्य है। भूटान में तो भूटानी मुद्रा चलती ही है। परन्तु भारत के सीमांत क्षेत्र में भूटानी मुद्रा का काफ़ी प्रचलन है। भूटानी नोट तो देखने मिले, लेकिन सिक्के कहीं दिखाई नहीं दिए। वैसे विदेशी मुद्रा के प्रति मेरा आकर्षण नहीं के बराबर है और नहीं मैं विदेशी मुद्रा अपने पास रखने की कोशिश करता हूँ।
भूटानी 100 रुपया
भूटानियों के नाम बहुत कठिन लगे, उच्चारण एवं याद रखने में। मुझे जो भी भूटानी मिले, उनमें किसी का भी नाम याद नहीं और न ही मैं याद रखने के लिए दिमाग पर जोर डाला। मुझे कौन सा यहाँ बसना है, जो इतनी माथापच्ची करुं। यहाँ दुकानों के दरवाजे बड़े नहीं होते। भारत में जैसे घर के दरवाजे 3 फ़ुट चौड़े होते हैं वैसे ही यहाँ दुकानों के द्वार भी होते हैं। एक दुकानदार से चर्चा हुई, वह अच्छी हिन्दी बोलता था। उसने मुझे रुपए एवं भूटानी मुद्रा के खेल के विषय में बताया कि भारत और भूटानी मुद्रा नोंगत्रम में कोई खास अंतर नहीं है और जो अंतर है वह आम आदमी की समझ में नहीं आता। भारत के सीमांत क्षेत्र में धड़ल्ले से भूटानी मुद्रा का चलन होता है।
स्ट्रीट मार्केट
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी क्षेत्र के बेलपाड़ा, नांगड़ाकाटा, तेलीपाड़ा, बीनागुड़ी, दालगांव और इथेबाड़ी इत्यादि स्थानों में भूटानी मुद्रा का भारतीय मुद्रा की तरह ही चलन है। भूटान की सीमा फ़्यूशलिंग के इस पार जयगाँव में भूटानी मुद्रा के 500 और 1000 के नोटों का चलन नहीं है। अगर आप किसी दुकानदार देगें भी तो वह नहीं लेगा। लेकिन जयगाँव से 25-30 किलोमीटर दूर बसे गाँव एंव कस्बों हासीमआरा, अलीपुर द्वार, कालचीनी, कालपाड़ा, हाशिमआरा, नंगड़ाकाटा और बानरहाटा में भूटानी नोट आराम से चल जाते हैं। यहाँ के लोग इन नोटों से व्यापार व्यवहार कर लेते हैं। इन नोटों के चलन के पीछे बड़ा गिरोह भी हो सकता है जो काले धन को एक नम्बर का बनाने का काम करता है।
रेड वाईन "टॉकिन"
जबकि भारत में अन्य किसी देश की मुद्रा में व्यापार एवं व्यवहार करना कानूनन अपराध है, परन्तु सीमा क्षेत्र में मांग के अनुसार व्यापारियों को भूटानी मुद्रा में लेन देन करना पड़ता है। अन्यथा उनका व्यापार ठप्प हो जाएगा। ग्राहक जो भी मुद्रा दें, उसे स्वीकार करना उनकी मजबूरी है। हमने थिम्पू में भारतीय मुद्रा से ही खरीदी की। दुकानों का संचालन अधिक औरते ही करती हैं और टीवी पर भारतीय गानों के फ़िल्में भी देखती हैं। इसके कारण उन्हें हिन्दी बोलने एवं समझने में कोई अत्यधिक परेशानी नहीं होती। 
भूटानी दुकान के समक्ष ब्लॉगर
थिम्पू के बाजार में शराब के लिए कोई अलग से दुकान नहीं है। किराने की दुकानों में शराब मिलती है। कोई भी बालिग व्यक्ति शराब खरीद सकता है। लोग राशन के साथ शराब खरीदते हैं। भूटान की लोकल शराब "टॉकिन" है, जिसमें अल्कोहल 16% है। रेड वाईन जैसी इस शराब का प्रचलन अधिक है और इसे बिना पानी या सोडा के इस्तेमाल किया जाता है। कुछ कुछ आयूर्वैदिक आसव जैसा स्वाद है। साथ ही सस्ती भी है। 750 एम एल की एक बोतल 140 रुपए मे मिल जाती है। मेरे सामने ही कुछ भूटानी महिलाएं राशन के साथ एक-एक बोतल टॉकिन खरीद कर ले गई। 
एक दृश्य
रिसोर्ट में आने के बाद हम लोगों का भोजन बन कर तैयार हो गया था। भोजन करने के उपरांत हमने अपने बिस्तर की शरण ली। बाहर ठंड बढ रही थी। रिसोर्ट के केयर टेकर कह रहे थी कि आज की रात पारा - 14 पार कर जाएगा। ब्लू पाईन की लकड़ी से रुम का फ़र्श एवं दीवारे बने होने के कारण रुम गर्म था तथा वाताकूलन की व्यवस्था भी थी। बैड के गद्दे में लगे हीटर का बटन चालु करके सो गए तो रात को रजाई में पसीने आ गए। कुल मिला कर ठंड से बचने का इंतजाम उम्दा था। मैदानी लोगों को पहाड़ की ठंड बर्दास्त नहीं होती। अब बाकी कल देखा जाएगा। आज की रात तो गुलजार हो कर गुजर रही है। ……… जारी है।

 

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