शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

खजुराहो शैली की प्रतिमाएँ : फ़णीकेश्वर महादेव


रायपुर से 70 किमी की दूरी पर फ़िंगेश्वर कस्बे में त्रिआयतन शैली का प्राचीन शिवालय है। त्रिआयतन से तात्पर्य है कि तीन गर्भगृह और संयुक्त मंडप। इन तीन गर्भ गृहों में मुख्य में फ़णीकेश्वर महादेव विराजे हैं और द्वितीय में शंख, गदा, पद्म चक्रधारी विष्णु स्थानक मुद्रा में हैं और तीसरे में मंदिर का कलश रखा हुआ है। 
फ़णीकेश्वर महादेव  फ़िंगेश्वर
इस मंदिर का मंडप सोलह स्तंभो पर निर्मित है। मंदिर का स्थापत्य उतना सुडौल एवं सुंदर नहीं है, जितना पाली एवं जांजगीर के कल्चुरी कालीन मंदिरों का शिल्प है। शिल्प की दृष्टि से यह परवर्ती काल तेरहवीं या चौदहवीं शताब्दी का माना जा सकता है। 
मिथुन प्रतिमा फ़णीकेश्वर महादेव
मंदिर की भित्तियों पर दो थरों में हल्के काले रंग के पत्थरों पर उकेरी गई प्रतिमाएँ जड़ी हुई हैं। इनमें भक्ति एवं भोग दोनों प्रदर्शित किए गए हैं। मिथुन प्रतिमाएं उस काल की शिल्प परम्परा का पालन करती दिखाई देती हैं। इन मिथुन प्रतिमाओं में वात्सायन के काम सूत्र में वर्णित, चुंबन, आलिंगन, मैथुन आदि को प्रदर्शित किया गया है। इसके साथ ही राम एवं कृष्ण से संबंधित प्रतिमाएँ भी दिखाई देती है। 
गंधर्व नृत्य गान
भित्ति शिल्प में मुरलीधर, अहिल्या उद्धार, हनुमान द्वारा शिव पूजन, उमा महेश्वर, नृसिंह अवतार, मत्स्यावतार, वराह अवतार, मेघनाद एवं लक्ष्मन का युद्ध, नृत्यांगनाएं एवं बादक, दर्पणधारी अप्सरा मुग्धा को भी स्थान दिया है।
मिथुन शिल्प फ़्णीकेश्वर महादेव
इस मंदिर के निर्माण के पार्श्व में छ: मासी रात वाली किंवदन्ति प्रचलित है। निश्चित तिथि पर मंदिर तैयार हो गया परन्तु कलश चढाने की समयावधि निकलने के कारण कलश नहीं चढ़ पाया और उसे एक गर्भ गृह में ही स्थापित कर दिया गया। 
रामायण के प्रसंग का अंकन
तिरानवे वर्षीय राजा महेन्द्र बहादुर कहते हैं कि उनके नाना के पुर्वज दो ढाई सौ वर्ष पहले जंगल में शिकार करने आए थे। यहाँ आकर उन्होंने झाड़ झंखाड़ के घिरे हुए इस सुंदर मंदिर को देखा तो इस स्थान पर ही बसने का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपनी जमीदारी का मुख्यालय फ़िंगेश्वरी को बना लिया और समस्त धार्मिक कर्मकांड इस शिवालय से ही सम्बद्ध हो गए।
मिथुनांकन फ़णीकेश्वर महादेव
फ़णीकेश्वर महादेव पंचकोसी यात्रा में सम्मिलित महादेव हैं, यहाँ मकर संक्राति के समय पंचकोसी यात्रा होती है। मान्यता है कि विष्णु के नाभि पद्म की पांच पंखुड़ियाँ चम्पारण, पटेवा, फ़िंगेश्वर, कोपरा एवं बहम्नेश्वर नामक स्थाक पर गिरी एवं उनसे चम्पेश्वर, पाटेश्वर, फ़णीकेश्वर, कर्पुरेश्वर, एवं बह्मनेश्वर नामक शिवलिंग पांच कोस में प्रकट हुए और तभी से श्रद्धालुओं द्वारा पंचकोसी यात्रा की जाती है। 

फ़णीकेश्वर महादेव नाम से प्रतीत होता है कि इसका निर्माण कलचुरी राजाओं के अधिन फ़णिनागवंशी शासकों ने कराया होगा। परवर्ती काल का होने कारण इसके प्रतिमा शिल्प में सुंदर सुडौलता नहीं होने पर इसका महत्व कम नहीं हो जाता।
ऊमा महेश्वर दरबार
यहाँ शक्ति उपासना का त्यौहार दशहरा उत्सव भी परम्परागत रुप से दो ढाई शताब्दियों से मनाया जाता है। यह पर्व दशमी तिथि को न मनाकर त्रयोदशी को मनाया जाता है। 

इस दिन समस्त मंदिरों में ध्वजारोहण के साथ पूजा पाठ किया जाता है। फ़िर महल से सवारी निकाली जाती है और नगर भ्रमण किया जाता है। इसके पश्चात महल में पान सुपारी (अतिथि स्वागत) की परम्परा का पालन किया जाता है। 
लो भई आखिर में हम भी आ गए
इस शिवालय की भित्तियों में जड़ी मिथुन प्रतिमाएँ किसी अन्य मंदिर से कम नहीं है और यह छत्तीसगढ़ के इतिहास की बहुमूल्य धरोहर है।

सोमवार, 26 सितंबर 2016

खारुन नदी के संग-संग सफ़र: उद्गम से पदयात्रा

कभी आप वनों में उबड़-खाबड़ पथरीले रास्तो के साथ बहती किसी अल्हड़ सी नदी के साथ-साथ चले हैं? नहीं न। फ़िर आज चलते हैं प्राकृतिक सुषमा के बीचे वनों से आच्छादित भूधरा पर प्रवाहित सलिला खारुन नदी के साथ उसके उद्गम के सफ़र पर। 
कंकालिन मंदिर पेटेचुवा
खारुन नदी रायपुर शहर की जीवन रेखा है, जिसका सफ़र बालोद जिले के ग्राम पेटेचुवा से प्रारंभ होकर सोमनाथ में शिवनाथ से मिलन तक का है। नदी का उद्गम ग्राम पेटेचुवा के नायक तालाब से हुआ है। यहाँ इसे कंकालीन नाला कहा जाता है, जो आगे चलकर नदी का रुप धारण कर लेता है।
खारुन उद्गम नायक तालाब
रायपुर से धमतरी होते हुए चारामा घाट से पहले दाँए तरफ़ मरकाटोला ग्राम से पेटेचुआ तक का सफ़र 115 किमी का है। 
नदी के साथ साथ पदयात्रा का आरंभ
इस छोटे से वनग्राम में कंकालीन माता का प्रसिद्ध मंदिर है। खारुन नदी कंकालीन मंदिर  की चौहद्दी से लगकर खैरडिग्गी ग्राम तक का पांच किमी का सफ़र घने वन के बीच से तय करती है। इस पांच किमी का सफ़र विभिन्न पड़ावों से होकर गुजरता है, यह ट्रैकिंग रोमांचित कर जाती है एवं अद्भूत अनुभूति से भर देती है। 
पदयात्रा के साथी, नारायण साहू, बन्नु राम
जब हम नदी के साथ साथ यात्रा प्रारंभ करते हैं तब पहला स्थान भालू खांचा नाम का स्थान मिलता है। इस खांचा में बारहों महीने पानी रहता है, जिसका उपयोग भालू करते हैं। 
खारुन नदी में भालू खांचा
अगले पड़ाव में भकाड़ू डबरी मिलती है, यह छोटा सा तालाब है, जो पानी से लबालब भरा रहता है, इसके नामकरन के पीछे की कहानी रोचक है। मेरे साथी रामकुमार कोमर्रा बताए हैं कि गाँव में भकाड़ू नामक अविवाहित व्यक्ति रहता था। उसकी मृत्यु होने पर उसके रक्शा (कुंवारा प्रेत) बन जाने के डर से ग्रामवासियों ने दाह संस्कार के श्मशान में भूमि नहीं दी। तब वन में तालाब के किनारे उसके दाह संस्कार का निर्णय लिया गया, तब से इस तालाब का नाम भकाड़ू डबरी पड़ गया।
जंगल के मध्य भकाड़ू डबरी
आगे बढने पर नदी के बीच चटान काट कर कोटना जैसी आकृति बनाने के कारण एक स्थान को कुकुर कोटना कहा जाता है, यहाँ कभी शिकारी कुत्ते पानी पीते थे। यहां हमने दोपहर के भोजन में गांव से बनाकर लाई हुई टमाटर की चटनी के अंगाकर रोटी का आनंद लिया। 
दोपहर का भोजन कुकुर कोटना में
अगला पड़ाव अइरी बुड़ान है, जहां मछली भोजन की तलाश में अइरी नामक चिड़ियों का डेरा रहता है। यहां एक स्थान ऐसा भी है जहाँ कि मिट्टी खारी है और उसे चाटने के लिए नीलगाय, चीतल, कोटरी आदि जानवर आते हैं, उनके खुरों के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते हैं। 
अइरी बुड़ान
अगला पड़ाव नाहर डबरी है, गहराई होने के कारण यहाँ नदी का पानी कुछ महीनो ठहर जाता है, जिसका उपयोग वन ग्राम नाहर के लोग करते हैं। यहां जंगल के खोदकर लाए हुए बेचांदी कांदा की प्रोसेसिंग की जाती है।
नाहर डबरी में बेचांदी कंद की प्रोसेसिंग
इस यात्र का महत्वपूर्ण स्थान मासूल है, यहां नदी गहराई में उतर जाती है, ऊपर नीचे रखी बड़ी चट्टानें इमारत होने का भ्रम उत्पन्न करती हैं। यह स्थान इतना रमणीक है कि कुछ पल ठहरने का मन हो जाता है तथा भालूओं से भी भेंट हो सकती है। क्योंकि इनके रहने के लिए यह आदर्श स्थान है। 
नदी का बीहड़ मार्ग
इस स्थान का मासूल नाम धरने के पीछे की कहानी तिहारु राम सोरी बताते हैं, मासूल एक बड़ा और मोटा सर्प होता है, जो एक स्थान पर ही पड़ा रहता, उस पर दीमक चढ़ जाती है, फ़िर भी नहीं हिलता। जो उसके मुंह के सामने आ जाता है उसे खा लेता है। एक बार मछली पकड़ने वालों ने उसे लकड़ी का लट्ठा समझ कर उठा लिया और पानी रोकने के लिए आड़ के रुप में लगा दिया। पानी में मछली देख कर जब उसने हरकत की तब पता चला कि यह मासूल सर्प है, तब से इस स्थान का नाम मासूल प्रचलित हो गया।
मनोरम स्थल मासुल
मासूल के आगे दोरदे नामक स्थान है, यहां से मछलियां नदी में ऊपर नहीं चढती। जंगल यहीं पर समाप्त हो जाता है और आगे खैरडिग्गी नामक गांव का खार लग जाता है। नदी का यह सफ़र आनंददायक है। 
जोहर ले, सफ़र के साथी तिहारु राम सोरी
जब भी यहां कि ट्रेकिंग करें तब ट्रेकिंग शुरु करने से पहले अपना वाहन खैरडिग्गी ग्राम में बुलवा लें, अन्यथा इसी रास्ते पर पुन: लौटना होगा। विशेष ध्यान रखे कि गांव के किसी जानकार व्यक्ति के साथ पर्याप्त भोजन पानी लेकर ट्रेकिंग करें।