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बैंगलोर के मड फ़ोर्ट के निर्माण की कहानी -7

यात्रा की थकान काफ़ी हो गई थी, एक दिन आराम करने के बाद अगले दिन बैंगलोर भ्रमण का कार्यक्रम बनाया गया। बैंगलोर  काफ़ी बड़ा है और भीड़ भरी सड़कों पर ही सारा समय निकल जाता है। पर्यटन करने के लिए वैसे बैंगलोर  में बहुत कुछ है, परन्तु पर्यटन अपनी रुचि के हिसाब से होता है। प्राचीन स्मारकों को देखने की रुचि होने के कारण हमने सर्च किया तो बंगलोर में तीन स्थान दिखाई दिए, पहला बैंगलोर  फ़ोर्ट, दूसरा बैंगलोर पैलेस, तीसरा टीपू सुल्तान का समर पैलेस, इसके बाद श्री रंगपट्टनम में टीपू सुल्तान का जन्म स्थल। इसके बाद गुगल मैसूर की जानकारियां देने लगता है।

हमने बैंगलोर शहर के अन्य स्मारक देखना ही तय किया। सुबह साढे नौ बजे नाश्ता करके हम बैंगलोर  दर्शन के लिए चल पड़े। एक डेढ घंटे चक्कर काटते हुए बैंगलोर फ़ोर्ट तक पहुंचे, उसके बगल में विक्टोरिया अस्पताल भी है। परन्तु वहाँ पार्किंग का स्थान नहीं होने के कारण आगे बढ़ गए। एक गोल चक्कर लगाने के बाद भी कोई पार्किंग का स्थान दिखाई नहीं दिया। लगातार चलते हुए अब माथा भी खराब होने लगा था। भीड़ एवं ट्रैफ़िक इतना अधिक रहता है कि मत पूछो। इससे एक सबक मिला कि अपनी गाड़ी के बजाए अगर कैब कर लेते तो सभी स्थान आराम से देखे भी जा सकते हैं और कोई समस्या भी नहीं रहती।
मड़ फ़ोर्ट बैंगलोर का मुख्य द्वार
किले के नाम पर वर्तमान में सिर्फ़ एक द्वार ही दिखाई देता है, जिसे दिल्ली गेट कहते हैं, जिन्होने राजस्थान एवं स्थानों के बड़े दुर्ग देखे हैं, उन्हें इस दुर्ग के नाम पर सिर्फ़ निराशा ही हाथ लगेगी। क्योंकि यह दुर्ग नष्ट हो चुका है और इसकी 95 प्रतिशत जमीन पर कब्जा होकर अन्य इमारते खड़ी हो गई हैं। वास्तव में यह मृदा भित्ति दुर्ग था, जिसे मड फ़ोर्ट कहते हैं। मड फ़ोर्ट बनाने के लिए उपयुक्त स्थान का चयन कर उसके चारों तरफ़ सुरक्षा गोलाकर खाईयाँ खोद दी जाती हैं। इसके निर्माण पत्थरों का प्रयोग नहीं होता। यह तात्कालिक तौर पर सुरक्षा उपलब्ध करता थै। छत्तीसगढ़ में इस तरह के दुर्गों की संख्या 48 तक पहुंच गई है।

इस किले का निर्माण 1537 में बैंगलोर शहर बसाने वाले केम्पे गौड़ा ने किया था। यह विजयनगर राज्य का जमीदार एवं बैंगलोर शहर का संस्थापक था। उसके बाद 1761 में हैदर अली ने इसमें निर्माण कार्य किया और इसे पत्थरों से निर्मित कर सुरक्षित किया। अंग्रेजों की सेना ने 21 मार्च 1791 को लार्ड कार्नवालिस के नेतृत्व में मैसूर के तीसरे युद्ध के दौरान इस किले की घेराबंदी कर अपने कब्जे में ले लिया। किसी जमाने में यह किला टीपू सुल्तान की नाक कहा जाता था आज इसका थोड़े से अवशेष और दिल्ली दरवाजा ही बाकी है। यहां पर अंगेजों ने अपनी विजय का जिक्र एक संगमरमर की पट्टिका में किया है।
मड फ़ोर्ट का प्लान
किले के लिए स्थान चयन एवं निर्माण के लिए कई किवंदन्तियाँ हैं। केम्पे गौड़ा एक बार शिकार के लिए जंगल में गया, शिकार करते हुए वह पश्चिम दिशा की ओर शिव समुद्र (हेसाराघट्टा) गाँव तक चला गया। यहां के शांत वातावरण को देख कर उसने इस स्थान को राजधानी बनाने के लिए उपयुत्क समझा। उसने यहां पर छावनी, जलाशय, मंदिर एवं व्यवसायियों के लिए बाजार की कल्पना की और इस स्थान पर राजधानी बनाने के निर्णय को स्थाई कर दिया। इस स्थान का एक केन्द्र बना कर उसने चारों दिशाओं में सजाए हुए सफ़ेद बैलों से जुताई कर राजधानी बनाने का कार्य प्रारंभ कर दिया।

इसके बाद मिट्टी के किले के लिए खाईयों का निर्माण किया गया और इसके नौ द्वार बनए गए। कहते हैं दक्षिण द्वार का जब निर्माण हो रहा था तब किसी विघ्न होने के कारण कार्य जल्दी सम्पन्न नहीं हो रहा था। किसी ने कहा कि यह मानव बलि मांगता है। अब बलि कौन दे और किसकी दे। तब केम्पे गौड़ा की भाभी लक्ष्म्मा ने रात्रि के समय तलवार से अपनी गर्दन काट कर बलि चढा दी। इसके बाद किले का निर्माण बिना किसी दुर्घटना से शीघ्रता से पूर्ण कर लिया गया। इसके बाद कोरमंगला में लक्ष्म्मा के नाम के एक मंदिर का निर्माण किया गया। अब इस मृदा भित्ति दुर्ग को बैंगलोर फ़ोर्ट कहा जाता है।
बैंगलोर फ़ोर्ट का गणेश मंदिर
इस किले में गणेश जी का एक मंदिर है। इसके साथ बैंगलोर का इतिहास जुड़ा हुआ है, परन्तु हमने अपने इतिहास को संजो कर रखना नहीं सीखा। यह किला अतिक्रमण की चपेट में आकर अपना वास्तविक स्वरुप खो चुका है। यह वही स्थान है जहां बीजापुर के सेनापति रुस्तमें जमां की तीस हजार फ़ौज को केम्पे गौड़ा की फ़ौज ने धूल चटाई थी। इतिहास की बातें तो इतिहास में दर्ज हो चुकी हैं और धूल का किला धूल धुसरित हो गया। यहाँ से हम बैंगलोर पैलेस के लिए चल पड़े। जीपीएस वाली बाई को उसका पता बताया गया और हम आगे बढ गए।

ब्लॉगर भोज सह ब्लॉगर मिलन: दक्षिण यात्रा - 6

बैंगलोर में हिन्दी ब्लॉगर बिरादरी भी रहती है, यह तो हम वर्षों से जानते थे और यहाँ पहुंचने के पूर्व भी ब्लॉगर मिलन का कार्यक्रम बन गया था। सोचा यह था कि एक दिन सभी किसी नियत स्थान पर एकत्रित हो जाएं तो सभी से मिलन हो सकता है। परन्तु हमारे प्रवास के दिनों में रविवार सम्मिलित नहीं था। रविवार तक तो हमें घर पहुंचना था। मंगलवार का रात्रि भोजन का निमंत्रण भाई आशीष श्रीवास्तव द्वारा मिला। हम रात्रि साढे आठ बजे के आस पास उनके घर पर पहुंच गए। घर पर उनके अलावा उनकी माता जी, श्रीमती जी एवं पुत्री गार्गी, कुल मिलाकर चार की नफ़री है।
पाबला जी, ललित जी, पीडी जी, आशीष जी एवं गार्गी जी :)
घर पहुंचने पर चाय पानी के संवाद चर्चा प्रारंभ हुई, ब्लॉग एगीगेटर नारद से लेकर चिट्ठा जगत, ब्लॉग वाणी इत्यादि की चर्चा के साथ हमारी वाणी एवं ब्लॉग सेती एग्रीगेटर का भी जिक्र हुआ। परन्तु ब्लॉगिंग का जो आनंद 2011 तक था वह इन एगीगेटरों के माध्यम से लौट कर नहीं आया। चिट्ठा जगत में उस समय 30 हजार ब्लॉग दर्ज थे। ब्लॉग वाणी सफ़ल एग्रीगेटर था, जल्दी खुल जाता था और फ़ीड भी एक बटन दबाने पर दिखाई देने लगती थी। मेरे डेस्कटॉप पर हमेशा खुला रहता था। जब भी समय मिला सरसरी तौर पर एक निगाह डाल लेता था। पर अब उस जैसा मजा नहीं, मैने कई वर्षों से किसी एग्रीगेटर की ओर झांक कर देखा ही नहीं।
आशीष श्रीवास्तव जी का छत्तीसगढ़ से नाता है, साथ पड़ोस के गोंदिया शहर के निकट के गाँव के निवासी भी हैं। वर्डप्रेस पर इनका ब्लॉग विज्ञान विश्व काफ़ी प्रसिद्ध है, इसके साथ ब्लॉग स्पॉट पर भी इनके कई ब्लॉग हैं। हमारे से सीनियर ब्लॉगर हैं, प्रारंभिक दिनों में इन्होनें हिन्दी ब्लॉगिंग को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चर्चा के बीच ये बार-बार किसी को फ़ोन लगा रहे थे। थोड़ी देर बाद द्वार उन्मुक्त हुआ और ब्लॉगर प्रशांत प्रियदर्शी सपत्नी प्रकट हुए। यह मेरे लिए बोनस जैसा था, उम्मीद से दुगना। प्राचीन ब्लॉगर प्रशांत प्रियदर्शी को निक नेम "पीडी" के नाम से जानते हैं। पीडी जी का ब्लॉग "मेरी छोटी सी दुनिया" है, इस पर दो बज्जिया बैराग बढिया पोस्ट चेपे हैं।
बातचीत करते खाना भी लग गया, खूब बातें हुई। नए पुराने ब्लॉगरों के जिक्र के साथ। जब ब्लॉगर साथ बैठेगें तो चर्चा होगी ही न। पाबला जी गार्गी की फ़ोटो लेते रहे। गार्गी ने लिखाई कर सारे घर की दीवारें रंग डाली हैं, मेरा बेटा उदय भी यही करता था, पर उसकी इन हरकतों में उसकी मां सतत निगाह रखती थी। थोड़े दिनों में उसकी यह आदत छूट गई। बच्चों के लिए दीवाल एक श्याम पट का काम करती है। जो चाहे मांड लो, जैसे चाहे पेंसिल घुमा लो। हमारे समय में तो चाक पेंसिल मिलती थी, जिसका लिखा कपड़े की एक रगड़ से साफ़ हो जाता था। आज की पेसिंलों का लिखा मिटाने के लिए फ़िर से दीवालें पोतनी पड़ती है।
भोजन के वक्त वजन कम करने की बात छिड़ गई। पाबला जी का वजन काफ़ी कम हो गया है और आशीष श्रीवास्तव जी ने भी अपना वजन भोजन पर नियंत्रण करके कम कर लिया। 2005 के आस पास हमारा भी वजन 103 किलो था, पर शक्कर अधिक होने के कारण धीरे धीरे कम होते होते 75 किली रह गया। वो तो भला हो डॉक्टर सत्यजीत साहू का जिन्होने इस पर ध्यान दिया, वरना हम तो घिसते घिसते आज 25 किलो के रह जाते। सारे कपड़े ढीले हो गए, नए कपड़े लेने पड़े। जब वजन बढने लगा तो फ़िर नए कपड़े आए। आज वजन ठीक है, 90-95 के बीच कांटा झूलते रहता है। वैसे भी एक उम्र में आकर डाईट पर नियंत्रण करना आवश्यक है। खासकर कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों के लिए।
राष्ट्रपति पुरस्कृत ज्योतिषी संगीता पुरी जी से कभी मजाक कह दिया करता हूँ कि ग्रहों के संकट निवारण के लिए "ब्लॉगर भोज" के लिए अपने क्लाईंटों को कहा करें, जिससे उनके संकट का निवारण शीघ्रता से हो जाएगा और समस्याओं का समाधान भी। यथा 5-11-21-51 ब्लॉगर श्रद्धानुसार जिमाने में कोई हर्ज नहीं है। वर्तमान में ब्लॉगर ही संकट मोचन बनकर सामने आए हैं। विभिन्न विषयों पर लिखे जा रहे ब्लॉगों के कारण ही गुगल पर जानकारियाँ उपलब्ध हो पाई हैं और इसमें ब्लॉगरों के योगदान को किसी काल में भी नकारा नहीं जा सकता। नेट पर हिन्दी ब्लॉगरों की ही देन है।
ब्लॉगरों की बैठकी तो ऐसी होती है, जैसे बहुत दिनों के बाद कोई घर छुट्टी आता है और सारी रात परिजनों से बातचीत में कट जाती है, सुबह पौ फ़टते पता चलता है कि बातचीत में ही रात गुजर गई। यहाँ भी रात बढने लगी तो चर्चाओं पर विराम देकर हमने आशीष जी से विदा ली। उत्तम ब्लॉगर भोजन से हृदय आनंदित हो गया था और अब एक लम्बी नींद की आवश्यकता महसूस हो रही थी। सभी नीचे छोड़ने आए और हम अपने ठिकाने होटल लौट आए। इस तरह एक छोटी सी ब्लॉगर बैठकी हो गई। आशीष जी का घर हमारे होटल से नजदीक ही था। जल्दी ही जीपीएस वाली बाई ने हमें होटल तक पहुंचा दिया और कहा " आपकी मंजिल आ गई है।" जारी है, आगे पढें…

 

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