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सूर्यमंदिर का निर्माण : इतिहास की महान परियोजना - कलिंग यात्रा

अभी तक सूर्यमंदिर के अधिष्ठान एवं भित्तियों पर जड़ी प्रतिमाओं पर ही एक नजर डाल रहे थे। अब बारी है मंदिर निर्माण एवं उसकी संरचना की। सूर्य मंदिर निर्माण की योजना साधारण नहीं है। काल के हिसाब से तत्कालीन राज्य के विशाल एवं महत्वाकांक्षी योजना थी। इसके प्रारुप निर्माण पर ही काफ़ी वक्त लगा होगा। प्रधान शिल्पकार बिशु महाराणा ने अपने निर्माण दल के साथ महीनों विचार विमर्श किया होगा तब कहीं जाकर इस योजना का प्रारुप तैयार हुआ होगा। हमने देखा है कि मंदिर की भित्तियों का कोई भी स्थान खाली नहीं है जिस पर शिल्पकार की छेनी के निशान नहीं है। ज्यामितिय आकृतियों के साथ भित्तियों पर विषयाधारित शिल्पांकन महत्वपूर्ण है। प्रतिमाओं में राजा के परिजनों से लेकर उनकी गतिविधियों को स्थान दिया गया है। अपने प्रज्ञानुसार तो बिशु (विष्णु) महाराणा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी होगी।

अगर कल्पना दृश्यांकन करें तो निर्माण स्थल पर मेला लगा रहता होगा। बारह सौ शिल्पकार और उनके सहयोगियों तथा निर्माण सामग्री पूर्तिकर्ताओं को मिलाकर कम से कम पांच हजार की मानव संख्या कार्य में लगी होगी। निर्माण स्थल पर इनकी दिनचर्या से संबंधित सारी वस्तुएं उपलब्ध कराई गई होगीं तथा इनके भोजन के लिए विशाल भोजनालय का भी अस्थायी निर्माण किया गया होगा। शिला निर्माण योजनाबद्ध हो रहा होगा। सैकड़ों लोहार लोहे की पट्टी तैयार कर रहे होगें जिनसे शिलाओं को बांधना है। प्रधान शिल्पी एक-एक निर्माण का स्वयं निरीक्षण कर रहा होगा। राजा के कारनून निर्माण कार्य में लगने वाले धन का संग्रह कर रहे होगें। निर्माण में गजबल एवं अन्य पशुबल के लिए भी चारा जुटाया गया होगा। आखिर एक विशाल स्मारक का निर्माण हो रहा था।

सिंहद्वार की एक प्रतिमा का वजन 28 टन बताया जा रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि निर्माण में 40 एवं 50 टन के भी प्रस्तर खंडों का प्रयोग किया गया होगा। इन पत्थरों को पहाड़ से काट कर अलग करने एवं निर्माण स्थल तक लाने में श्रम के साथ धन भी पानी की तरह बहाया होगा। तेरहवी सदी वैसे भी विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली थी। निर्माण के लिए आधुनिक यत्रों का प्रयोग किया गया होगा। पत्थरों पर कारीगरी करने के लिए जल की आवश्यकता भी होती है। निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पहले जल की भी व्यवस्था की गई होगी। छेनी हथौड़ी की लयबद्ध तान निर्माण स्थल पर बरसों गुंजती रही होगी और शिल्पकारों का पसीना बह कर चंद्रभागा नदी में मिल कर समुद्र को और भी खारा कर गया होगा। 

कलिंग की अपनी विशिष्ट शैली है, जिसमें कोणीय अट्टालिका पर मंडप की तरह छतरी ढ़ंकी होती है। यह मंदिर भी  उड़ीसा के अन्य मंदिरों जैसा ही है। मुख्य गर्भ गृह की ऊंचाई 229 फ़ुट मापी गई है। गर्भ गृह के साथ नाट्यशाला 128 फ़ुट ऊंची है। मंदिर का मुख्य प्रांगण 857 फ़ुट X 50 फ़ुट का है। यह मंदिर पुर्व एंव पश्चिम दिशा में बना है। निर्माण में प्रयुक्त प्रत्येक शिला को लोहे की पट्टियों (क्लैंप) से बांधा गया है। शिलाओं को स्थापित करने में कहीं पर भी अन्य लेपन (चूना या अन्य) का प्रयोग नहीं किया गया। मंदिर के समस्त निर्माण को योजनानुसार एक दूसरे पत्थर के साथ लौह बंधन में ही बांधा गया है। इसका उदाहरण हमें मंदिर में कई स्थानों पर मिलता है।

मंदिर का निर्माण गंग वंश के प्रतापी नरेश नरर्सिह देव (प्रथम) (1238-64 ई.) ने अपने एक विजय के स्मारक स्वरूप कराया था। इसके निर्माण में 1200 स्थपति 12 वर्ष तक निरंतर लगे रहे। अबुल फजल ने अपने आइने-अकबरी में लिखा है कि इस मंदिर में उड़ीसा राज्य के बारह वर्ष की समुची आय लगी थी। उनका यह भी कहना है कि यह मंदिर नवीं शती ई. में बना था, उस समय उसे केसरी वंश के किसी नरेश ने निर्माण कराया था। बाद में नरसिंह देव ने उसको नवीन रूप दिया। इस मंदिर के आस पास बहुत दूर तक किसी पर्वत के चिन्ह नहीं हैं, ऐसी अवस्था में इस विशालकाय मंदिर के निर्माण के लिये पत्थर कहीं दूरस्थ स्थान से लाए गए होगें। खैर अबुल फ़जल कुछ भी कहे पर मंदिर निर्माण के साथ नरसिंह देव का ही नाम जुड़ा हुआ है।. पुरी के मदल पंजी के आंकड़ों के अनुसार, और कुछ 1278 ई. के ताम्रपत्रों से पता चला, कि राजा लांगूल नृसिंहदेव ने 1282 तक शासन किया. कई इतिहासकार, इस मत के भी हैं, कि कोणार्क मंदिर का निर्माण 1253 से 1260 ई. के बीच हुआ था।

इतिहास की कहानी प्रमाणों के अभाव में अनुमान पर ही गति प्राप्त करती है। इस मंदिर के निर्माण से लेकर विध्वंस तक अनुमान ही लगाए जा सकते हैं। कोई भी सदा के लिए साक्षी नहीं हो सकता। एक कालखंड तक ही जीवित साक्ष्य मिल पाते हैं। कहते हैं कि मंदिर में पूजा नहीं हो सकी। यह मंदिर बिना प्राण प्रतिष्ठा के ही रह गया। अगर मुख्य गर्भ गृह में प्रतिमा की स्थापना हो जाती तो पूजा भी अनिवार्य रुप से शुरु हो जाती। पूजा न होने के पीछे भी कई कहानियाँ सामने आती हैं। सर्व प्रथम तो कहा जाता है कि मुख्य शिल्पकार बिशु महाराणा के पुत्र की मृत्यु मंदिर निर्माण के समय हो गई थी। इसे अपशुगन मान कर आगे का कार्य पूर्ण नहीं हो सका। एक अन्य किंवदन्ति कहती है कि मंदिर निर्माण के दौरान ही राजा की अकाल मृत्यु हो गई। इसलिए निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो सका। खैर उस काल में जो भी हुआ हो परन्तु कोणार्क के रुप में दुनिया को एक अद्भुत कृति प्राप्त हो गई। जो वर्तमान में भी विद्यमान है।

मंदिर के विध्वंस के विषय में भी कई किंवदन्तियां सुनाई देती हैं। कहा जाता है कि मंदिर निर्माण में वास्तु दोष था इसलिए मंदिर में पूजा न हो सकी और कालांतर में ध्वस्त हो गया। अब तथाकथित वास्तु शास्त्रियों को भी अपना उल्लू सीधा करने का साधन मिल गया। सबसे बड़ा वास्तुकार और वास्तुशास्त्री तो बिशु महाराणा था जिसने राजा की परिकल्पना को साकार किया। इतनी बड़ी योजना पर कार्य करने वाला वास्तुकार और शिल्पकार इतना मुर्ख नहीं होगा कि उसे वास्तु ग्रंथों का ज्ञान ही न हो और राजा भी इतना मुर्ख नहीं होगा कि जो अनाड़ी व्यक्ति के हाथों में अपने जीवन की सबसे भव्य एवं महत्वपूर्ण परियोजना को किसी ऐरे गैरे के हाथों में बर्बाद करने के लिए दे दे। आज व्यक्ति छोटा सा दो कमरों का मकान बनाता है तो वह खर्च करने से पहले किसी वास्तुकार से नक्शा बनवा कर उसकी देख रेख में कार्य शुरु करता है। जारी है आगे पढ़े…

दक्षिण अफ़्रीका देशों से कलिंग के सम्बंध - कलिंग यात्रा


जो राजा प्रजा वत्सल होता है वही राज्य में लोकप्रिय होता है और प्रजा उसे पिता तुल्य मानती है। उसके एक संकेत पर धन जन न्यौछावर हो जाता है। राज्य की व्यवस्था संचालन के लिए धन एवं सैनिक दोनो की आवश्यकता होती है। अगर राजा की कराधान व्यवस्था प्रजा अनुकूल है तो उसे प्रजा के प्रेम के साथ धन भी सहजता से उपलब्ध होता था। लूट पाट कर प्रजा का खून चूसने वाला राज्य अधिक दिनों तक स्थाई नहीं रहता। वर्तमान में भी यही दिखाई देता है। कोणार्क की भित्तियो पर राजकाज को भी स्थान दिया है। राज सभा की गतिविधियों का चित्रण करते हुए तत्कालीन शासक को अपने दरबारियों से मंत्रणा करते हुए दिखाया गया है। शांतिकाल एवं युद्ध काल की राज सभा स्पष्ट दिखाई देती है।  
युद्ध पूर्व मंत्रणा
प्रतिमा संकेतों से ज्ञात होता है कि राजा नृसिंह देव के शासन काल में उन्हें राज्य रक्षा के लिए युद्ध भी लड़ने पड़े। एक चित्र में दिखाया गया है कि सिंहासनारुढ़ नृप अपने राज सभासदों एवं दरबारियों से मंत्रणा कर रहा है। सभी उसकी आज्ञा का पालन करने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं। साथ ही दरबार के बाहर अश्व एवं गज सेना तैयार है कि युद्ध मंत्रणा और रणनीति पर चर्चा सम्पन्न होते ही सेना युद्ध के लिए कूच कर जाएगी। एक अन्य प्रतिमा में अश्वारुढ़ राजा को शीश विहीन दिखाया गया है। इससे ज्ञात होता है कि किसी भीषण युद्ध में राजा ने अभूतपूर्व युद्ध कौशल का परिचय देते हुए शत्रु सेना को आतंकित कर प्राण त्याग दिए, प्राणोसर्ग पर्यंत भी उसका धड़ युद्ध करते रहा। युद्ध में अश्व गतिमान दिखाई दे रहा है। शीश कटने के बाद युद्ध करने की कई किवदंतियाँ समाज में प्रचलित हैं। इसका सीधा अर्थ राजा के द्वारा भीषण युद्ध रचाने से लगाया जाता है।
मंत्रणोपरांत युद्ध के लिए प्रयाण
किसी भी राज्य के विकास के लिए शांति का काल महत्वपूर्ण होता है। शांति काल में राज्य चतुर्दिक उन्नति करता है। प्रजा हितों के लिए शासन नयी योजनाएं बनाता है और उन्हें लागु भी करता है। सड़क, बावड़ी, कुंओं, मंदिरों, सरोवरों एवं भवनों का निर्माण होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के द्वारा प्रजा के मनोरंजन की व्यवस्था भी होती है। युद्धकाल न होने से प्रजा पर अतिरिक्त करों का भार भी नहीं लादा जाता। जिसके कारण राज्य में खुशहाली का वातावरण होता है। कला एवं कलाकारों को भी प्रश्रय मिलता है और उन्हें उचित जीविकोपार्जन हेतु मानदेय के साथ सम्मान भी मिलता है। इस चित्र में राजा शांतिकाल में अपने विश्वस्त परिजनों एवं अनुचरों से चर्चा करते दिखाई दे रहे हैं। यह सब शांति काल में ही संभव है।
शीश विहीन योद्धा रण में गतिमान अश्वारुढ़
एक अन्य प्रतिमा से राजा के विषय में एक नई जानकारी मिलती है। यह तो सभी जानते हैं कि शांति काल में राजाओं का प्रमुख मनोरंजन का साधन आखेट होता था और आखेट के लिए वनों में दूर-दूर तक जाकर शिविर लगाए जाते थे। आखेट हेतु राजा समस्त लाव लश्कर के साथ जाता था। इस प्रतिमा चित्र में दिखाया गया है कि राजा हाथी पर हौदे में सवार होकर हाथ में धनुष लेकर आखेट के लिए वन में है और हाथी गतिमान है। उसके सामने कई लोग दिखाई दे रहे हैं जो हाथ उठाकर राजा से कुछ कह रहे हैं या उसका स्वागत कर रहे हैं इसके साथ शिकार हेतु हांका करने की आज्ञा मांग रहे हैं। शिकार के लिए हांका करना महत्वपूर्ण एवं श्रम साध्य कार्य होता था।
शांतिकाल की मंत्रणा, संभवत: मंदिर निर्माण पर विचार विमर्श
इनके साथ एक जिराफ़ भी दिखाई दे रहा है। जाहिर है जिराफ़ भारत में तो पाया नहीं जाता। जिराफ़ दक्षिण अफ़्रीका के वनों में सोमालिया तक पाया जाता है। इससे यह जानकारी मिलती है कि कलिंग का राजनीयिक संबंध दक्षिण अफ़्रीका से था तथा कलिंग के राजा आखेट हेतु अफ़्रीका के वनों तक जाते थे। बीसवीं सदी में सरगुजा महाराज रामानुजशरण सिंह देव द्वारा अफ़्रीका के वनों में शिकार करने का उल्लेख है तथा वे विश्व के तीसरे बड़े शिकारी माने जाते हैं। उन्होने 1100 शेरो का शिकार किया था। यह आंकड़ा उनके नाम से गिनीज बुक में भी दर्ज है। इससे इस धारणा को बल मिलता है कि कलिंग राजा भी आखेट के लिए अफ़्रीका के वनों तक जाते थे। ऐसे राजा को प्रतापी राजा ही कहा जाएगा।
अफ़्रीका के वनों में नृप हाथी एवं जिराफ़
तत्कालीन जनजीवन की झांकी दिखाते हुए कुछ प्रतिमाएं भी बहुत सुंदर दिखाई देते हैं। इस प्रतिमा में एक व्यक्ति ने हाथ में छूरी धारण कर रखी है और दूसरे हाथ में कुत्ते की एक टांग पकड़ कर उल्टा लटका रखा है। शायद शिल्पकार इस चित्र में मनो विनोद प्रदर्शित करना चाहता है। जब राजा गजारुढ़ होकर शेर और जिराफ़ का शिकार कर सकता है तो एक आम आदमी कुत्ते का शिकार क्यों नहीं कर सकता। एक वानर स्तंभ पर चढ़ कर उसके इस कार्य को विस्फ़ारित आंखो से देख रहा है। कुत्ता भी मुंह फ़ाड़ कर कांय कांय कर रहा है आखिर जान उसको भी प्यारी है। एक बात और हो सकती है, हो सकता है उस समय लोग कुत्ते का मांस खाते हों, वैसे उत्त्तर पूर्व में आज भी कुत्ते का मांस बड़े चाव से खाया जाता है। 
स्वान संहार का दृश्य
अन्य प्रतिमा में एक दंपत्ति अपने बच्चे के साथ जीवन यापन के लिए पलायन कर रहा है और थकने पर मार्ग में वृक्ष ने नीचे कुछ पल के लिए ठहर गया है। परम्परागत उड़िया परिवार दिखाई दे रहा है। पुरुष ने भी जूड़ा बना रखा है, कमर पर पोटली धारण कर रखी है, एक हाथ में धारित खड़ग कांधे पर है, दूसरा हाथ पीछे छुपा हुआ है, स्त्री ने सिर पर समान की पेटिका रखी हुई है और कमर पे बच्चे को बैठाकर स्तनपान करवा रही है। सिर पर रखा कुंदे वाला बक्सा वर्तमान में भी प्रचलन में दिखाई देता है। स्त्री के गले में हार और मंगलसूत्र दिखाई दे रहा है। जिसका बड़ा सा पैंडल स्तन मध्य में झूल रहा है। उड़ीसा से आज भी लोग जीवन यापन के लिए अन्य प्रदेशों की ओर पलायन करते हैं, यह पलायन तब से आज तक सतत जारी है। शिल्पकार ने इस दृष्य को इतना अधिक जीवंत बनाया है कि जैसे यह आज ही मेरे समक्ष घट रहा हो। 
जीवन यापन के लिए पलायन करते दंपत्ति
इस तरह कोणार्क भी भित्तियों पर उत्कीर्ण प्रतिमाएं इतिहास की परतें लगातार खोलती हैं अगर आपके पास समय है तो वे तत्काल आपके साथ संवाद करने को तत्पर हैं। बस समझना आपको है कि वे क्या कह रही हैं। भित्तियों पर इतने सारे विषयोन को स्थान दिया गया है कि अनुसंधान करने में ही बरसों लग जाएगें। कोणार्क का शिल्पांकन एक खुली किताब की तरह है, आईए और पढ़ते जाइए, इतिहास के सागर में गोता लगाते जाईए आपको सारे रत्न मिल जाएगें और सबसे कीमती रत्न संतोष रत्न मिलेगा। जिसे प्रत्येक व्यक्ति प्राप्त करना चाहता है। राज नृसिंह देव भी भव्य मंदिर का निर्माण कर युगों युगों तक के लिए अपनी कीर्ति स्थापना कर संतोषानंद पाना चाहता था। आगे पढ़ेगें मंदिर के निर्माण एवं पतन की कहानी। जारी है आगे पढ़ें……॥ 

 

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