गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

मासूल : खारुन नदी की रोमांचक यात्रा

कुकुर कोटना से आगे बढ़ने पर मुझे सूखी हुई वह घास दिखाई दी, जिसे मेले ठेले में लोग संजीवनी बूटी कह कर बेचते हैं। यह सूखी घास पानी में डालने पर फ़िर से हरी हो जाती है। रामकुमार ने बताया कि इसे भठेलिया (लाल खरगोश) चारा कहते हैं, यह भठेलियों का भोजन है। 
भालुओं का भोजन
यहां से हम आगे बढे ही थे कि मुझे पत्तों में  सरसराहट की आवाज सुनाई दी, मुड़ कर देखा तो एक बड़ा किंग कोबरा सरसराते हुए निकल रहा था। उसकी लम्बाई भी सात आठ फ़ुट रही होती, इसे गंउहा डोमी कहा जाता है। मैने साथियों को आवाज दी तो उन्होने उसे दूर भगा दिया।
जंगल का भठेलिया चारा, शहर की संजीवनी बूटी
नदी के कुछ स्थानों पर गांव वालों ने मछली पकड़ने का ठिकाना बना रखा है, उस ठिकाने पर कोई दूसरे गांव वाला मछली नहीं पकड़ सकता है,  यह जंगल का अघोषित नियम है। सब गांव वालों का अपना-अपना दहरा है। आगे बढ़ने पर चट्टानें बड़ी होती जाती हैं। इस स्थान को मासुल कहा जाता है। मासुल पहुंच कर नदी एक छोटे से झरने का रुप ले लेती है।
तिहारु राम सोरी बीज साफ़ करते हुए
यहाँ पर तिहारुराम कुछ फ़ल तोड़ लाया। उनको फ़ोड़ कर नदी के जल में बीजों को धोया और मेरे को खाने के लिए दिए। बीज देते वक्त उसके मन में प्रकट हो रहे भावों को मैं देख रहा था, ये वही भाव थे जो जिस भाव से सबरी ने रामचंद्र को बेर खिलाए थे। नितांत निश्छल प्रेमिल मुस्कान के साथ उसने बीज मेरी ओर बढाए। बीजों के उपर लगे गुदे का स्वाद कुछ कुछ सीताफ़ल के  जैसे था। मैं उस फ़ल का नाम भूल गया, परन्तु स्वाद अभी तक याद है।
भालु के पंजो के निशान
मासुल बहुत बीहड़ दिखाई देता है। पत्थरों के बीच की गुफ़ाएं भालुओं एवं अन्य जंगली जानवरों के छिपने के लिए आदर्श स्थान है। कउहा (अर्जुन) के ऊंचे पेड़ों पर मधुमक्खियों के बड़े बड़े छत्ते लटक रहे थे और पेड़ों पर भालूओं के पंजो के निशान भी। नीचे देखने पर नदी की रेत में भालुओं के पंजो के निशान दिखाई दिए। नदी के पार तीन भालु विचर रहे थे। साथियों ने मुंह से आवाज निकाल कर उन्हें भगाया क्योंकि हमें मासुल से उतर कर नदी पार करनी थी।
मासुल से खारुन नदी का नजारा
मासुल इस ट्रेकिंग का बहुत ही सुंदर एवं मनोरम स्थल है। यहाँ आकर मन रम गया। एक चट्टान काफ़ी ऊंचाई पर लगभग 12 फ़ुट तक बाहर निकली हुई है। उस पर बैठकर नदी का दृश्य आनंददायक दिखाई देता है। तिहारु राम ने मासुल नाम के विषय में बताया कि यह स्थान गहरा होने के कारण यहाँ से मछलियां ऊपर नहीं चढती। लोग यहां पर मछली मारने के लिए आते हैं। एक दिन पानी रोकने के लिए लकड़ी का लट्ठा ढूंढने लगे तो समीप ही दीमक लगा लट्ठा मिल गया। उन्होंने उठाकर उसे काम में ले लिया।
अर्जुन के वृक्ष पर भालु के पंजों के निशान
कुछ देर बात लट्ठे में हलचल हुई तो पता चला कि मासुल सर्प है। मासुल सर्प आलसी होने के कारण एक स्थान पर ही पड़ा रहता है। उसके मुंह के सामने जो कीड़े मकोड़े आ जाते हैं उन्हें खाता है। यहाँ तक कि उस दीमक भी चढ़ जाती है। उस दिन के बाद इस स्थान का नाम मासूल पड़ गया। कुछ देर यहां बैठकर भालुओं को भगाने के बाद हम धीरे-धीरे नदी में उतरे, क्योंकि आगे भालुओं का खतरा था।
मासुल का नजारा
नदी पार करके आधा किमी चलने के बाद खैरडिगी गांव का खार (खेत) आ गया। हमने गांव में पहुंच कर एक के घर में चाय बनवा कर पी। अब लौटने के लिए कोई साधन नहीं मिला। हमारी गाड़ी कंकालीन मंदिर में ही खड़ी थी। अब फ़िर पैदल चलकर लौटने के अलावा कोई चारा नहीं था। हमने नदी का साथ छोड़ दिया और उसके बगल से चरवाहों वाले रास्ते से कंकालीन लौटने लगे। फ़िर उबड़-खाबड़ रास्ते का सामना किया। 

खारुन ट्रेकिंग का सुंदरतम स्थान मासुल
दिन ढलने से पहले हम कंकालीन पहुंच जाना चाहते थे। ट्रेकिंग के शौक ने आज खूब पैदल चला दिया था। दो घंटे लगातार चलने के बाद कंकालीन मंदिर दिखाई देने लगा और सूरज भी ढल रहा था। मन में खुशी थी कि आज हमने खारुन नदी की कठिन ट्रेकिंग कर ली थी।
उबड़ खाबड़ पत्थरों के बीच से मार्ग बनाते हुए वापसी
थकान बहुत अधिक हो गई थी, तिहारु राम सोरी भी नाहर डबरी से हमारे साथ लौट आया था। मैने उन्हें कुछ पैसे दिए और हम घर लौट आए कि बाकी ट्रेकिंग दो चार दिन बाद शुरु करेंगे। सुबह उठकर देखा कि दोनों पैरों के अंगुठे नीले हो कर फ़ुल गए हैं। देखते ही घबराहट बढ गई। तुरंत डॉक्टर के पास दौड़ा उसने दवाईयाँ दी। डर रहा था कि कहीं गैंगरिन न हो जाए। 
पैरों की हालत: अंगुठे के साथ दो अंगुलियों के नाखून भी नीले हो गए
तीन महीने बाद एक पैर के अंगुठे का नाखून थिम्पू में निकला और दूसरा दिल्ली में तथा आगे की ट्रेकिंग पर विराम लग गया। मेरा मानना है  कि लोग पहाड़ों पर जाते हैं ट्रेकिंग के लिए, परन्तु छत्तीसगढ़ में ऐसे स्थानों की कमी नहीं है, जहाँ आप अपना रोमांचक शौक पूरा न कर सें। कभी आप भी ट्रेकिंग करके देखिए।

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

कुकुर कोटना : खारुन नदी की रोमांचक पदयात्रा

चलते-चलते बन्नु सिंह अपनी कथा कहता जा रहा था "मुझसे धनी कोई नहीं है, ये पत्थर देखो। एक-एक पत्थर कितना मंहगा है। ये पेड़ देखो, जिसे दीमक खा रही है, यह कितना मूल्यवान है। जंगल वाले ही सारा जंगल काट कर ले गए। अब तो जलाऊ के लायक भी लकड़ी नहीं दिखाई देती। 

बन्नु सिंह और नारायन साहू
फ़ालतू का काड़ी-कचरा उगा हुआ है। अगर इन पत्थरों को ही गाड़ी मोटर में भर के शहर ले जाए तो लाखो-कड़ोरों रुपए के हैं। उधर देखो साहब, पेड़ों पर चारों तरफ़ नोट ही नोट लटके हैं। एक-एक पत्ता सौ-सौ का नोट है। अब बताओं आप, मुझसे अमीर कौन है? ये सारा जंगल मेरा है और मैं इसका मालिक हूँ। मेरे ही धन को लोग चोरा कर ले जा रहे हैं।" 
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हमारी अमानत
मैं बन्नु राम की बात सुनकर उससे सहमत होता हूँ, जंगल के मालिक तो वे ही हैं जो उनसे प्यार करते हैं, उसकी रखवाली करते हैं। जंगल कटने एवं खत्म होने का दर्द वही महसूस कर सकता है, जिसका जीवन उसके साथ जुड़ा है। जिस पेड़ को मैने लगाया है, उसे काटने की हिम्मत मैं जुटा नहीं पाता। इसके कारण मेरे घर परिसर में कई महावृक्षों ने विस्तार ले लिया है, जो अब हानि भी पहुंचा रहे हैं। फ़िर तो बन्नु सिंह जंगल का ही आदमी है। 
पथरीली नदी घाटी
वह मुझे मुक्त कंठ से एक रेलो गीत सुनाता है। जो जंगल में गूंजता है और मैं उसे रिकार्ड करता हूँ… "साय रेलो रे रेलो रे रेलो, नदी नादर निहिर निहिर ताघर ता, ओSS रोहुर झुहुर झुहुर बाजेर तिहिर तोर। गांवे रे गांवे रे घुमेर बाबू कहे नादर तोर। ओSS नादर लोहर लोहर लोघर तोर।" सुनसान जंगल में उन्मुक्त कंठ से गाया हुआ गीत बिना साज के ही सुहाना लग रहा था तथा आनंद दे रहा था। पहले रेडियो में बस्तर के रिलो गीतों का रायपुर से प्रसारण होता है, एक अरसे के बाद बन्नु सिंह के मुंह से गीत सुना। बन्नु सिंह के गीत मुझे जंगल के साथ जोड़ रहे थे। 
एक पड़ाव कुकुर  कोटना
वनवासी के गीतों ने मेरे अंतरमन को वन के साथ एकाकार कर दिया था, पर कदम उबड़-खाबड़ पत्थरों पर पड़ते हुए सावधान थे। सफ़र चल रहा है बलखाती इठलाती कुंवारी नदी के साथ। अइरी बुड़ान के बाद हम जिस स्थान पर पहुंचे, साथियों ने इस स्थान का नाम कुकुर कोटना बताया। यहाँ चट्टान को काटकर दो ढाई फ़ुट चौड़ी नाली सी बनाई हुई है। पहले जंगल में शिकार करने वालों के कुत्ते इस स्थान पर पानी पीने आते थे। कोटना के आगे थोड़ी गहराई है, इन चट्टानों के नीचे काले केकड़े छिप रहते हैं, एक साथी केकड़े पकड़ने के लिए पानी में उतर गया। 
कुकुर कोटना पर दोपहर का भोजन पानी
सूर्य सिर पर चढ गया था, हमने अपने खाने की पोटली खोल ली। रामकुमार के घर से बनाकर लाई हुई अंगाकर रोटी सभी लोगों ने आपस में बांट ली। अंगाकर रोटी छत्तीसगढ़ का पारम्परिक भोजन है। रोटी इतनी बड़ी होती है कि एक रोती चार आदमियों का पेट भरने के लिए पर्याप्त है। कुकुर कोटना पर बैठकर भोजन समाप्त करते तक साथी ने कई केकड़े पकड़ कर अपने झोले के हवाले कर लिए। दोपहर का भोजन इतमिनान से हो गया। जारी है… आगे पढें।