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तरीघाट में प्राचीन सभ्यता के अवशेष

 जे. आर. भगत 

भनपुर से 14 किलोमीटर की दूरी पर प्रवाहित खारुन नदी के बांए तट पर बसा है तरीघाट गाँव। तरीघाट जैसा की नाम से प्रतीत होता है कि यह कोई नदी का निचले किनारे स्थित घाट होगा, इसलिए तरीघाट कहलाता है। खारुन नदी रायपुर एवं दुर्ग जिले को विभाजित करती है। एक किनारा रायपुर जिले में है और दूसरा किनारा दुर्ग जिले में। खारुन नदी में पानी बारहों महीने रहता है और भिलाई या पाटन जाने के लिए इस नदी को डोंगी से पार करके जाना पड़ता था। फ़िर एक दशक पूर्व पास के गाँव वाले रपटा बना लेते थे और उससे जाने वाले से कुछ शुल्क लेकर कमाई करते थे। मैने मोटर सायकिल से खारुन नदी को कई बार पार किया और कभी इसके काई लगे पत्थरों पर बाईक सहित गिरकर घुटने भी फ़ोड़वाए। कुछ वर्षों पहले इस नदी पर पुल बन गया और आवागमन सहज होने लगा।

अतुल प्रधान, नरेन्द्र शुक्ल, जे. आर. भगत उत्खनन का शुभारम्भ  
अभनपुर से दुर्ग जाने के लिए इस रास्ते का प्रयोग सदियों से हो रहा है। अब इस अंचल से प्राचीन कालीन मानव बसाहट के अवशेष मिलने लगे हैं। रास्ते  के गाँव चंडी में देवी का प्रसिद्ध मंदिर है तथा इसका निर्माण भोसला राजाओं द्वारा किया प्रतीत होता है। मंदिर की दक्षिण दिशा में तालाब का भी निर्माण हुआ है तथा सैनिक बसाहट के भी चिन्ह मिलते हैं। इससे आगे चलने पर नदी के दांए तट पर परसुलिडीह गाँव एवं बांए तट पर तरीघाट गाँव बसा है। परसुलिडीह से ही नदी के उस पार बड़े बड़े टीले दिखाई देने लगते हैं। इन टीलों पर अकोल के वृक्षों की भरमार है। इन टीलों की सतह पर काले और लाल मृदा भांड के अवशेष पाए जाते हैं। जिससे सिद्ध होता है कि इस स्थान प्राचीन बसाहट रही होगी। ग्रामीणों ने यहाँ महामाया का मंदिर बना रखा है और एक टीले पर रावण भी विराजमान होने से यह रावण भाटा भी है।

बसाहट का माडल 
छत्तीसगढ़ शासन के पुरातत्व विभाग के उप संचालन जे आर भगत ने विधिवत सर्वे कर शासन से इस स्थान पर उत्खनन की अनुमति प्राप्त की। 17 मार्च को लगभग सांय 4 बजे तत्कालीन पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के संचालक नरेन्द्र शुक्ला ने उत्खनन का शुभारंभ किया और इस स्थान पर उत्खनन प्रारंभ हो गया। उत्खनन सहयोगी के रुप में अतुल प्रधान यहाँ मुस्तैदी से तैनात हैं। कुछ दिनों के बाद रावण भाटा वाले स्थान पर उत्खनन प्रारंभ हो गया। 23 मार्च को मैं यहाँ पहुंचा तो बसाहट के चिन्ह उजागर हो चुके थे। यहाँ बसाहट के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रागैतिहासिक काल से लेकर मौर्य काल, शुंग काल, कुषाण काल एवं गुप्त काल तक के अवशेष प्राप्त हो रहे हैं। इससे यह तो तय है कि छत्तीसगढ़ में मल्हार के बाद पहली बार कहीं इतनी पुरानी सभ्यता के चिन्ह प्राप्त हो रहे हैं।

टीले पर उत्खनन और पार्श्व में खारुन नदी 
उत्खनन में सिरपुर जैसी कोई बड़ी संरचना तो प्राप्त नहीं  हो रही, परन्तु टेराकोटा के बर्तन, मूर्तियाँ, बीटस बड़ी मात्रा में प्राप्त हो रहे हैं। साथ ही लोहा, तांबा से बनी वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं। मानवोपयोगी दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुएं दिया, मटकी, सुराही, मर्तबान, सिल-बट्टा, सिरेमिक का एड़ी घिसने का बट्टा इत्यादि भी प्राप्त हो रहा है। सुत्रों से प्राप्त सूचना के आधार ज्ञात हुआ है कि कुषाण वंशीय तांबे के सिक्कों के साथ गुप्त कालीन सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। लोहे के औजारों में भालों के फ़ाल, ठेकी के मुसल का लोहा इत्यादि प्राप्त हुआ है। इन प्राप्तियों से छत्तीसगढ़ के इतिहास में परिवर्तन होगा एवं इतिहास समृद्ध भी होगा। जे आर भगत उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं से उत्साहित है और कहते हैं कि हो सकता है यहाँ 16 महाजनपदों में से किसी एक जनपद के अवशेष प्राप्त हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इस साईट की तिथि सिरपुर से भी आगे निकल गई है।

उत्खनन में प्राप्त संरचना का स्तर 
तरीघाट के आस-पास के गाँवों में भी पुरा सामग्रियाँ प्राप्त हो रही हैं। जिसका तत्त्कालिक उदाहरण ग्राम पंदर में मनरेगा के दौरान उत्खनन में प्राप्त वस्तुएं हैं। इससे जाहिर होता है कि सातवाहनों का प्रसार पाटन तक था एवं गाँव का पंदर नाम बंदर का अपभ्रंश हो सकता है। नदी के किनारे यहाँ पर पहले कभी डाक यार्ड रहा होगा। तरीघाट में स्थित इन 4 टीलों के चारों तरफ़ पत्थर के परकोटे बने हुए हैं। जब यहाँ बसाहट थी तो ये परकोटे सुरक्षा घेरे का काम करते थे। उत्खनन के दौरान ज्ञात हुआ कि सभी घर पंक्तिबद्ध रुप से बसे थे और उनके बीच चौड़ी सड़क के साथ गलियाँ भी थी। कई घरों से रसोई प्राप्त हुई है, जहाँ चुल्हे की राख के साथ के मिट्टी के दैनिक उपयोग के बर्तन प्राप्त हुए हैं। मिट्टी के दीये बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। उत्खनन सतत चल रहा है तथा प्राचीन सभ्यता के चिन्ह निरंतर अनावृत हो रहे हैं। मेरा अनुमान है कि नदी के किनारे इस स्थान पर सैनिक छावनियाँ हो सकती हैं। आगे उत्खनन से और भी स्थिति साफ़ होगी तथा ज्ञात होगा कि इस स्थान का इतिहास में क्या महत्व  था?

त्रिपुरी के कलचुरि

त्रिपुर सुंदरी तेवर

ज का दिन भी पूरा ही था हमारे पास। रात 9 बजे रायपुर के लिए मेरी ट्रेन थी। मोहर्रम के दौरान हुए हुड़दंग के कारण कुछ थाना क्षेत्रों में कर्फ़्यू लगा दिया गया था। आज कहीं जाने का मन नहीं था। गिरीश दादा को फ़ोन लगाए तो पता चला कि वे डूबलिया कार्यक्रम में डूबे हुए हैं। ना नुकर करते 11 बज गए। आखिर त्रिपुर सुंदरी दर्शन के लिए हम निकल पड़े। शर्मा जी नेविगेटर और हम ड्रायवर। दोनो ही एक जैसे थे, रास्ता पूछते पाछते भेड़ाघाट रोड़ पकड़ लिए। त्रिपुर सुंदरी मंदिर से पहले तेवर गाँव आता है। यही गाँव विजय तिवारी जी का जन्म स्थान एवं पुरखौती है। हमने त्रिपुर सुंदरी देवी के दर्शन किए और कुछ चित्र भी लिए। मंदिर के पुजारी दुबे जी ने बढिया स्वागत किया। 

तेवर का तालाब
ससम्मान देवी दर्शन के पश्चात हम तेवर गाँव पहुंचे। राजा हमे सड़क पर खड़ा तैयार मिला। तेवर गाँव में प्रवेश करते ही विशाल तालाब दिखाई देता है। कहते हैं कि यह तालाब 85 एकड़ में है। अभी इसमें सिंघाड़े की खेती हो रही हैं। तेवर पुरा सामग्री से भरपूर गांव है। जहाँ देखो वहीं मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं। कोई माई बाप नहीं है। खंडित प्रतिमाए तो सैकड़ों की संख्या में होगी। इससे मुझे लगा कि यह गाँव कोई प्राचीन नगर रहा होगा। तालाब के किनारे पर शिवालय दिखाई दे रहा था और एक चबुतरे पर शिवलिंक के साथ कुछ भग्न मूर्तियाँ भी रखी हुई थी। ग्राम के मध्य में एक स्थान पर खुले में उमा महेश्वर की प्रतिमा रखी हुई है, यहाँ कुछ लोग पूजा कर रहे थे। ढोल बाजे गाजे के साथ कुछ उत्सव जैसा ही दिखाई दिया।

तेवर की बावड़ी
इससे आगे चलने पर एक विशाल बावड़ी दिखाई देती हैं। इसके किनारे पर एक मंदिर बना हुआ है, इस मंदिर में एक शानदार पट्ट रखा हुआ है जिसमें बहुत सारी मूर्तियाँ बनी हुई हैं। इस मंदिर के ईर्द गिर्द सैकड़ों मूर्तियाँ लावारिस पड़ी हुई हैं जिनका कोई माई बाप नहीं है। इसके बाद राजा हमें एक घर में मूर्तियाँ दिखाने ले जाता है, वहां पर सिंह व्याल की लगभग 5 फ़िट ऊंची प्रतिमा है, जिसे रंग रोगन लगा दिया गया है और उसके साथ ही दर्पण में प्रतिबिंब देखते हुए श्रृंगाररत अप्सरा की सुंदर प्रतिमा भी दिखाई थी। पास ही चौराहे पर उमामहेश्वर की एक बड़ी भग्न प्रतिमा रखी हुई है। राजा यहाँ से हमें झरना दिखाने ले चलता है। 

झरने में गड्ढे
4-5 किलो मीटर कच्चे रास्ते पर जाने के बाद एक स्थान पर झरना दिखाई देता है। इस स्थान के आस-पास बड़े टीले हैं और टीलों के बीच के मैदान में गाँव के बच्चे क्रिकेट खेलते हैं। उम्मीद है कि इन टीलों में भी कोई न कोई मंदिर या भवन के अवशेष अवश्य ही दबे पड़े होगें। झरने का जल निर्मल है, हमने यहीं पर बैठ कर भोजन किया और झरने के निर्मल जल पीया। झरने की तलहटी में लगभग 1 फ़ीट त्रिज्या के कई गड्ढे बने हुए हैं और यहीं पर शिवलिंग भी विराजमान है। साथ ही एक दाढी वाले बाबा की मूर्ति भी रखी हुई है जिसे विश्वकर्मा जी बताया जा रहा है। अवश्य ही यह किसी राजपुरुष की प्रतिमा होगी। विजय तिवारी जी ने बताया था कि त्रिपुर सुंदरी मंदिर के रास्ते में खाई में महल के अवशेष भी दिखाई देते हैं। 

विशाल मंदिर का मंडप
हम महल के अवशेष देखने के लिए खाई पर पहुंचे, वहाँ सब्जी बोने वालों ने अतिक्रमण कर रखा है। कहते हैं कि सड़क निर्माण के दौरान यहाँ से बहुत सारी पुरासामग्री निकली है और मिट्टी के कटाव में बहुत सारे मृदा भांड के अवशेष हमें भी दिखाई दिए। झाड़ झंखाड़ के बीच हम खाई में उतरे और मंडप तक पहुंचे। यह किसी विशाल मंदिर का मंडप है। गर्भगृह के स्थान पर एक गड्ढा बना हुआ है, खजाने के खोजियों ने यहाँ पर भी अपना कमाल दिखा रखा है। इस गड्ढे को लोग सुरंग कहते हैं। बताया जाता है यहाँ से रास्ता महल तक जाता था। खाई में सैकड़ों की संख्या में बिल दिखाई दे रहे थे ऐसी अवस्था में अधिक देर हमने ठहरना मुनासिब न समझा। क्योंकि यह स्थान सांपों के लिए मुफ़ीद स्थान है। 

अप्सरा
अब तेवर के ऐतिहासिक महत्व की चर्चा करते हैं, पश्चिम दिशा में भेड़ाघाट रोड पर स्थित वर्तमान तेवर ही कल्चुरियों की राजधानी त्रिपुरी है जो कि शिशुपाल चेदि राज्य का वैभवशाली नगर था। इसी त्रिपुरी के त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध करने के कारण ही भगवान शिव का नाम ‘त्रिपुरारि‘ पड़ा। यहाँ स्थित देवालयों एवं भग्नावशेषों से ही ज्ञात होता है कि कभी यह नगर वैभवशाली रहा होगा। तेवर की प्राचीनता हमें ईसा की पहली शताब्दी तक ले जाती है। तेवर जिसे हम त्रिपुरी कहते हैं यह चेदी एवं त्रिपुरी कलचुरियों की राजधानी रहा है।  गांगेय पुत्र कल्चुरी नरेश कर्णदेव एक प्रतापी शासक हुए,जिन्हें ‘इण्डियन नेपोलियन‘ कहा गया है। उनका साम्राज्य भारत के वृहद क्षेत्र में फैला हुआ था। सम्राट के रूप में दूसरी बार उनका राज्याभिषेक होने पर उनका कल्चुरी संवत प्रारंभ हुआ। कहा जाता है कि शताधिक राजा उनके शासनांतर्गत थे।

भग्नावशेषों का निरीक्षण करते हुए
जबलपुर के पास ही गढ़ा ग्राम पुरातन "गढ़ा मण्डलराज्य' के अवशेषों से पूर्ण है। गढ़ा-मण्डला गौड़ों का राज्य था गौड़ राजा कलचुरियों के बाद हुए हैं। जबलपुर के पास की कलचुरि वास्तुकला का विस्तृत वर्णन अलेक्ज़ेन्डर कनिंहाम ने अपनी रिपोर्ट (जिल्द ७) में किया है। प्रसिद्ध अन्वेषक राखालदास बैनर्जी ने बी इस विषय पर एक अत्यन्त गवेष्णापूर्ण ग्रंथ लिखा है। भेड़घाट और नंदचंद आदि गाँवो में भी अनेक कलापूर्ण स्मारक हैं। भेड़ाघाट में प्रसिद्द "चौंसठ योगिनी' का मंदिर। इसका आकार गोल है। इसमे ८१ मूर्तियों के रखने के लिए खंड बने हैं। यह १०वीं शताब्दी में बना है। मन्दिर के भीतर बीच में अल्हण मन्दिर है। इन सभी स्थानों में मन्दिरों और मूर्तियों में जिस प्रकार की कला पाई जाती है। 

हमारा त्रिपुरी दर्शन पूर्णता की ओर था। राजा को गाँव में छोड़ कर हम जबलपुर वापस आ गए, मुख्यमार्ग में कर्फ़्यू लगे होने के कारण कई घुमावदार रास्तों से गुजरते हुए हम सिविल लाईन पहुंचे। यहाँ से स्टेशन थोड़ी ही दूर है, 9 बजे हमारी ट्रेन का टाईम था और अमरकंटक एक्सप्रेस हमारी रायपुर वापसी थी। नियत समय पर ट्रेन पहुंच गई और जबलपुर की यादें समेटे हुए चल पड़ा अपने गंतव्य की ओर नर्मदे हर नर्मदे हर का जयघोष करते हुए।

 

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