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भारतीय रेल : चित्र प्रदर्शनी बिलासपुर

चुनावी सरगर्मी के साथ शादियों का माहौल भी गर्म है। आम चुनाव और शादियों के मुहूर्त एक साथ आते हैं। जिससे दोनों ही प्रभावित होते हैं। 18 अप्रेल को एक शादी के सिलसिले में बिलासपुर जाना था तथा 19 को भी एक शादी में सम्मिलित होना था। इस तरह 2 दिनी बिलासपुर प्रवास तय हो गया। बिलासपुर रेल्वे जोन ने रेल्वे पर आधारित एक प्रदर्शनी का आयोजन किया था। इस प्रदर्शनी को देखने की भी ललक थी। "कहाँ शुरु कहाँ खत्म" आत्मकथा के लेखक द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी को फ़ोन करने पर उन्होने कहा कि "बिलासपुर में आप मेरे मेहमान रहेगें।" मेरा इरादा था कि एक रात बिल्हा रुका जाए और अगली सुबह फ़िर बिलासपुर पहुंच जाऊंगा। पर द्वारिका प्रसाद जी के स्नेहिल आग्रह को टाल न सका। 
आत्मकथा लेखक श्री द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी
प्रदर्शनी की अंतिम तिथि 18 तारीख बताई गई थी। मैने सोचा कि शाम 5 बजे तक प्रदर्शनी का समापन हो जाएगा तो देख नहीं पाऊंगा। इसलिए दोपहर को ही बिलासपुर के चल पड़ा। शाम को 4 बजे तक पहुंच कर भी एक घंटे का समय प्रदर्शनी के लिए मिल जाएगा। बिलासपुर पहुंचने पर द्वारिका प्रसाद जी स्टेशन पर ही मिल गए। हम प्रदर्शनी स्थल ढूंढते हुए डी आर एम ऑफ़िस के आगे तक पहुंच गए। आसमान में बादल होने के कारण गर्मी का असर कम ही था। एक तरह से मौसम सुहाना ही बन गया था। आखिर ढूंढते हुए प्रदर्शनी तक पहुंच गए। तो हॉल के सभी दरवाजे बंद थे। मैने सोचा कि समापन हो गया लगता है। परन्तु हॉल में कूलर चलने का संकेत मिलने पर समझ आ गया कि भीतर कोई तो है। आवाज देने पर दरवाजा खुल गया। दरवाजा खोलने वाले ने बताया कि प्रदर्शनी की तारीख बढ़ा कर 20 कर दी गई है।
भिलाई स्टील प्लांट का पावर इंजन
हॉल में थोड़ी सी ही जगह में फ़ोटो प्रदर्शनी लगाई गई थी। अगर सरसरी तौर भी निगाह डालें तो 5 मिनट में मामला रफ़ा-दफ़ा हो सकता था। लगभग 30 पुराने चित्र लगाए गए थे। जिनमें रेल्वे संचालन से संबंधित जानकारियाँ दिखाई गई थी। अगर पार्श्वालोकन करें तो 1887 में बंगाल नागपुर रेल्वे के अंतर्गत बिलासपुर में रेल लाइन बिछी और 1890 में बिलासपुर स्टेशन बना तथा 1891 में बिलासपुर जंक्शन। बिलासपुर में सुंदर रेल्वे कालोनी बसाई गई, जो शहर से काफ़ी दूर थी। प्रारंभिक काल में स्टीम इंजन चलते थे। प्रदर्शनी में स्टीम इंजन के चित्र भी दिखाई दिए, जो सवारी गाड़ी एवं माल गाड़ी को खींचते थे।
रायपुर धमतरी नैरोगेज लाईन का भाप इंजन
एक चित्र रायपुर धमतरी रेल लाईन के स्टीम इंजन का था। जिसे देखकर मेरी पुरानी यादें ताजा हो गई। मेरे निवास के एक कोने पर इस नेरोगेज लाईन का आउटर सिगनल है। गर्मी के दिनों में जब भी यह स्टीम इंजन इधर से गुजरता था तो ड्रायवर भाप का प्रेसर बढा कर धुंए के साथ कोयले भी उड़ाता था। इन जलते हुए कोयलों से सूखी घास में आग लग जाती थी। शाम को वक्त तो हमें पानी की बाल्टी भरकर तैयार रहना पड़ता था। घास में आग लगते ही बुझाया करते थे। अब भाप के इंजन की छुक छुक की आवाज एवं मधूर सीटी गुजरे हुए जमाने की बात हो गई। इस स्टीम के इंजन को डी आर एम ऑफ़िस रायपुर के बाहर ट्राफ़ी बना कर रखा गया है।
पुल निर्माण - हैट वाले इंजीनियर के साथ कुत्ता भी दिखाई दे रहा है।
रेल्वे के शुरुवाती दिनों में पहाड़ों को काटकर बोग्दे बनाकर एवं नदियों पर पुल बना कर यातायात सुगम किया गया। इस निर्माण से संबंधित चित्र भी प्रदर्शनी में रखे गए। उस समय सभी व्यक्ति सिर पर पगड़ी पहनते थे। इस चित्र में नंगे सिर कोई नहीं दिखाई दे रहा। इंजीनियर के निर्देशन में पुल के निर्माण का कार्य चल रहा है। जिसमें गार्डर लगाने के लिए रस्सी एवं चैन पुल्ली जैसा यंत्र भी दिखाई दे रहा है। इस चित्र में महत्वपूर्ण बात तो यह दिखाई दी कि इंजीनियर का पालतू कुत्ता भी उसके साथ पुल निर्माण की कार्यवाही तल्लीनता से देख रहा है। यह उनके पशुप्रेम को प्रकट करता है।
गोंदियां रेल्वे स्टेशन का हिन्दू टी स्टाल
1932 के एक चित्र से तत्कालीन सामाजिक स्थिति का पता चलता है। यह चित्र "हिन्दू-चाय" की दुकान का है। उस जमाने में मुस्लिम और हिन्दूओं में इतना अधिक विभाजन था कि हिन्दू मुसलमान के हाथों का भोजन ग्रहण नहीं करते थे। इसलिए रेल्वे ने हिन्दू टी स्टाल का अलग से निर्माण कराया। इनके लिए पानी के नलके भी अलग रहते थे। उस समय लम्बी दूरी का मुसाफ़िर पीने का पानी अपने साथ लेकर चलता था। ज्ञात हो कि जयपुर के महाराज सवाई मान सिंह द्वितीय 1902 में एडवर्ड सप्तम के राजतिलक समारोह में सम्मिलित होने इंग्लैंड गए थे तो चांदी के कलशों में लगभग 8000 लीटर गंगाजल अपने साथ ले गए थे।
शंटिग के लिए हाथी का सहारा
उस समय रेल्वे डिब्बों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए हाथियों का सहारा लेती थी। स्टीम इंजन को चलाने के लिए कोयले के भंडार के साथ पानी भी भरपूर व्यवस्था की जाती थी। इंजन में कोयले भरने के बाद उसमें पानी डाला जाता था, जिससे कि कोयला सूखने पर उसमें आग न लग जाए। इंजनों के दिशा परिवर्तन के लिए गोल घर बनाए जाते थे। जिस पर इंजन को चढाकार लेबर धक्का मार कर उसका दिशा परिवर्तन करते थे। यह व्यवस्था राजस्थान के फ़ूलेरा, जोधपुर जैसे स्टेशनों पर मैने देखी है।
बोग्दा
जनशक्ति के आवागमन के लिए रेल्वे उपयोगी साधन बन गया। आजादी के पहले रेल संचालन खंड-खंड में निजी कम्पनियों द्वारा किया जाता था। जिनके अलग-अलग प्रतीक चिन्ह हुआ करते थे। इस प्रदर्शनी में इन निजी कम्पनियों के प्रतीक चिन्हों को भी प्रमुखता से दर्शाया गया। रेल्वे के एकीकरण के पश्चात इसका प्रतीक चिन्ह बदल गया। इन प्रतीक चिन्हों को देखने के पश्चात पता चलता है कि किन कम्पनियों द्वारा रेल परिवहन का संचालन हो रहा था। 
निर्माण के दौरान क्रेन का उपयोग
ऐसी एक रेल मारवाड़ जंक्शन से उदयपुर के लिए खामली घाट होते हुए चला करती थी। जो जोधपुर रियासत की निजी रेल थी। इस रेल से मुझे यात्रा करने का सौभाग्य 1990 में मिला था। शायद अब यहाँ अमान परिवर्तन के कारण यह रेल नहीं चलती हो। रेल चित्र प्रदर्शनी से लौट कर हम श्री जगदीश होटल पहुंचे। कुछ देर विश्राम करने के पश्चात आशीर्वाद समारोह में सम्मिलित हुए। अगला दिन हमने मल्हार दर्शन के लिए तय किया। 

तुम बहुत याद आओगे …………

जैसा नाम था वो वैसा ही अलबेला था। मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि वो अलबेला कवि हमारे बीच नहीं रहा। दो तीन पहले ही उसके अस्वस्थ होने की सूचना मिली थी और मैने ईश्वर से प्रार्थना की थी। मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं हुई और अलबेला कवि हमें छोड़ कर अनंत यात्रा पर चल पड़ा। सृष्टि का नियम है जिसे आना है उसे जाना ही पड़ेगा। परन्तु इतनी कम उम्र में जाना होगा ये सोचा भी नहीं था। मेरा और अलबेला कवि का परिचय अधिक दिनों का नहीं, बस कुछ वर्षों का ही था। परन्तु जब भी हम मिले तो ये नहीं लगा कि किसी औपरे आदमी से मिल रहा हूँ। वही आत्मीयता और वही अपनापन। 
रायपुर प्रेस क्लब में - गिरीश पंकज, अनिल पुसदकर, बी एस पाबला, अलबेला खत्री, ललित शर्मा, राजकुमार ग्वालानी, शरद कोकास

राज भाटिया जी ने जब तिलियार (रोहतक हरियाणा) में ब्लॉगर मीट का आयोजन किया तो मैं पानीपत से भाई यौगेन्द्र मौद्गिल के साथ रोहतक पहुंचा। अगले दिन ब्लॉगर मीट में सम्मिलित होने अलबेला खत्री विशेष रुप से रोहतक पहुंचे। ब्लॉगर मीट के पश्चात राज भाटिया जी के घर में हमारी महफ़िल जमी। जिसमें नीरज जाट, केवल राम, अंतर सोहिल थे। यौगेन्द्र मौदगिल जी तो रात को पानीपत लौट गए थे। मुझे सर्द गर्म हो गई थी तो इन्होने मुझे अपने बैग से अजवाईन निकाल कर दी और गर्म पानी के साथ लेने कहा। सुबह उठने पर सर्दी गायब हो गई थी। रात भर कविताओं का दौर चलता रहा और मैने अपने ब्लॉग से छांट-छांट कर कविताएँ पढी। 4 बजे तक कवि गोष्ठी चलती रही। इधर नीरज जाट और केवल राम खर्राटे भरते रहे। 
रोहतक में - अलबेला खत्री, संगीता पुरी, ललित शर्मा, राजीव तनेजा योगेन्द्र मौद्गिल

एक ब्लॉग़र के रुप में अलबेला खत्री की अलग ही पहचान थी। शब्दों के खिलाड़ी थे वह। जब भी मंच पर पहुंचते रौनक जमा देते। मेरा जब भी मौज लेने का मन होता तो रात 12 बजे भी फ़ोन लगा लेता था और फ़िर ठहाके गुंजते थे बियाबान में भी। एक दिन मुझे फ़ोन लगा कर कहा कि पिथौरा के कवि सम्मेलन में आ रहा हूँ और वापसी में मुलाकात होगी। उस दिन मैं विशेष तौर पर सिर्फ़ उनसे मिलने के लिए रायपुर पहुंचा। पिथौरा से बस आयी और अम्बेडकर चौक से मैने अलबेला को अपने साथ लिया। एक सूटकेस था उसके हाथों में और सांस फ़ूली हुई थी। मतलब दो कदम भी चलना मुस्किल था। सूटकेस मैने उठा लिया और हम पैदल-पैदल चल कर संस्कृति विभाग में राहुल भैया के दफ़्तर में पहुंचे। उस दिन मुझे लगा कि इन्हें अस्थमा है। वहाँ से हम अनिल पुसदकर जी के आफ़िस पहुंचे और कुछ देर रुक कर अनिल भाई के साथ हम उन्हे स्टेशन छोड़ने गए। उन्हें हावड़ा अहमदाबाद की ट्रेन से सूरत जाना था।
रायगढ़ मे- अलबेला खत्री, ललित शर्मा, प्रताप फ़ौजदार, वी पी सिंह, यौगेन्द्र मौद्गिल

अक्टुबर माह में रायगढ़ स्थित नलवा प्लांट में आफ़िसर्स क्लब द्वारा कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था। अलबेला भाई एवं प्रकाश यादव जी के विशेष आग्रह पर मुझे भी 19 अक्टुबर के इस कार्यक्रम में सम्मिलित होना था। सुबह एयरपोर्ट से प्रताप फ़ौजदार एवं यौगेन्द्र मौद्गिल जी को साथ लेकर बिलासपुर पहुंचे और वहाँ से प्रदीप चौबे जी को लेकर शाम होते तक रायगढ़ पहुंचे। इसी में सारा दिन चला गया। रायगढ़ पहुंचने पर कर्नल वीपी सिंग और अलबेला खत्री जी से भेंट हुई। मंच पर पहुंचने की तैयारी करते हुए अलबेला भाई ने हुक्का जैसा इन्हेलर निकाला और दवाई डाल कर दो-तीन सुट्टे मारे। अस्थमा का जोर दिखाई दे रहा था और उनकी सांस फ़ूल रही थी। थोड़ी देर में सांस स्थिर हुई तो हम मंच पर पहुचे। एतिहासिक कवि सम्मेलन था। उसके बाद हम साथ ही रायपुर लौटे।
रोहतक में सुबह की चाय - अलबेला खत्री और राजभाटिया जी

अलबेला खत्री का पूरा नाम टिकमचंद खत्री था। पर काव्य मंचों पर अलबेला खत्री के नाम से ही प्रसिद्धि मिली। रायगढ़ कवि सम्मेलन के बाद हमारी मुलाकात नहीं हुई। परन्तु फ़ोन पर चर्चा होते रहती थी। विगत एक माह से कोई फ़ोन पर कोई चर्चा नहीं हुई थी सिर्फ़ फ़ेसबुक की राम राम चल रही थी। अपडेट से पता चला था कि 8 अप्रेल को सोनीपत में कवि सम्मेलन है जिसमें सुनीता शानु भी उपस्थित रहेगी। इससे पहले ही उनकी अस्वस्थता का समाचार आ गया और 8 अप्रेल को कवि सम्मेलन में उपस्थित होने से पूर्व ही अलबेला भाई हमें छोड़ कर चले गए। कहा जाए तो उनके जाने से साहित्य जगत, ब्लॉग मंच एवं कवि सम्मेलन के मंच के साथ मेरी भी व्यक्तिगत क्षति हुई है। अब वो ठहाके सिर्फ़ यादों में ही रह गए। रह रह कर अभी गूंजते हैं मन की गहराईयों में। चलो संयोग हुआ तो फ़िर कभी मुलाकात होगी………

 

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