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कुंभ दर्शन की अभिलाषा लिए उज्जैन की ओर

हिन्दु धर्म में कुंभ मिलन को महत्वपूर्ण माना गया है। यह नदियों के तट पर भरता है और लाखों करोड़ों श्रद्धालु मिलन एवं स्नान का आनंद उठाते हैं। यह परम्परा सहस्त्राब्दियों से जारी है। वैसे तो नदियों के तट पर हमेशा जाना होता है, पर कुंभ पर्व पर कभी नहीं पहुंच पाया था। विगत चार वर्षों से उज्जैन सिंहस्थ कुंभ की प्रतीक्षा कर रहा था कि कब हो और मैं इसमें सम्मिलित होऊँ। आखिर वो दिन आ ही गया। मध्य प्रदेश के उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन हुआ, इसकी व्यवस्था की खबरों पर मेरी निरंतर निगाह थी। साथी अनुज राम साहू जी को तैयार किया, वे भी साथ चलेगें ये तय हो गया। 
उज्जैन की ओर सुधीर पाण्डे जी के साथ
मैने उज्जैन  जाने के लिए बीकानेर एक्सप्रेस से टिकिट करवा ली थी। परन्तु आखिर तक बर्थ कन्फ़र्म नहीं हुई, चार्ट निकल गया। पर सीट नहीं मिली। बिना आरक्षण के मुझसे लम्बा सफ़र नहीं होता। लगभग 10 बजे कसडोल से सुधीर पाण्डे जी का फ़ोन आया। वे भी सपरिवार कुंभ जा रहे थे। उन्होने कहा कि चिंता न करें, हमारे पास तीन कन्फ़र्म बर्थ हैं, जैसे तैसे पहुंच ही जाएंगे। उनके इस आश्वासन से कुछ ढंढास बंधा। मैने कहा कि भाटापारा से ट्रेन में बैठते ही फ़ोन कर देना। जिससे हमें कोच एवं बर्थ नम्बर की जानकारी हो जाए। हम शाम को स्टेशन पहुंच गए और ट्रेन से उज्जैन से सुधीर जी के साथ कुंभ के सफ़र पर निकल लिए। 
सहयात्री अनुज साहू जी
रात को उन्होने एक सीट हमे दे दी, जिस पर मैं और अनुज भाई फ़िट हो गए और एक सीट पर माता जी, एक सीट पर वे दोनो पति पत्नी एडजेस्ट हो गए। कुंभार्थियों को एक सीट देकर उन्होने यहीं से कुंभ स्नान का पूण्य प्राप्त करना प्रारंभ कर दिया। सुबह हुई, गाड़ी धीरे धीरे सरकते हुए बढ रही थी, हम एक एक स्टेशन गिनते हुए दोपहर को उज्जैन पहुंचे। मैने उज्जैन पहुंचने से पहले वहाँ ठहरने के लिए दो तीन स्थानों पर व्यवस्थाएँ विकल्प के तौर पर कर रखी थी। पहला शैलेन्द्र शर्मा जी ने स्टेशन के सामने एक होटल बता रखा था, दूसरा हमारे संस्कृति विभाग का पंडाल था, तीसरा हमारे प्रदेश के जनसम्पर्क विभाग का डोम। ट्रेन से उतर कर सुधीर भाई तो रामघाट स्नान के लिए चल दिए, उन्हें आज शाम की इसी गाड़ी लौटना था। 
छत्तीसगढ़ का भव्य पेवेलियन
हम होटल पर पहुंचे, तो उसने एक कमरा दिखाया, जिसका किराया दो हजार प्रतिदिन का बताया। हमने शैलेन्द्र जी को फ़ोन किया, उन्होंने होटल वाले से बात की तब भी उसने किराया कम नहीं किया। हमको यहाँ सप्ताह भर रुकना था, अगर होटल लेते तो चौदह हजार रुपए तो सिर्फ़ किराया ही हो जाता और इतने रुपए हमें कहीं से नहीं मिलने थे। यहाँ उज्जैन की व्यवस्था के लिए संस्कृति विभाग के जोशी जी लगे हुए थे, उन्हें फ़ोन करते के साथ वे गाड़ी लेकर स्टेशन आ गए और हम सदावल रोड़ पर स्थित छत्तीसगढ़ सरकार के पेवेलियन की ओर चल दिए। सारा कुंभ उजड़ा हुआ था, पांच तारीख की शाम को भयंकर तूफ़ान आया था, जिसमें पंडाल और डोम उखड़ गए, कई कुंभार्थियों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ गया।
पंडवानी कार्यक्रम की प्रस्तुति
छत्तीसगढ़ पेवेलियन पहुंचने पर उप संचालक श्री दिनेश मिश्रा जी ने हमें प्लाई बोर्ड से बनी एक खोली दे दी। जिसमें एक कूलर, लाईट एवं आरो के पानी की व्यवस्था थी। परन्तु द्वार पर ताला नहीं था। कुंभ में अगर आपको सेप्रेट रुम मिल जाए, इससे बढकर कोई वीआईपी व्यवस्था नहीं हो सकती। यहाँ से रामघाट लगभग दो किमी की दूरी पर था। छत्तीसगढ़ सरकार ने यहाँ प्रदेश से कुंभ स्नानार्थियों के अच्छी व्यवस्था कर रखी थी। चार बड़ डोम बने हुए थे, जिसमें एक एक हजार आदमी आराम से रुक सकते थे। बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था के लिए बड़े जनरेटर लगे हुए थे। भोजन की भी उत्तम व्यस्था थी। एक पंडाल में यहाँ छत्तीसगढ़ पर्यटन एवं जनसम्पर्क की फ़ोटो प्रदर्शनी लगी थी, साथ ही शाम 6 बजे से छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रति दिन आयोजन हो रहा था।
कलाकार की एक भंगिमा
हम स्नानाबाद से लौट कर तैयार हुए, आज तो सिर्फ़ यहीं आस पास घूमना था। पंडाल के बाहर एक चक्कर काट कर आए तब तक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारंभ हो चुके थे। आज पंडवानी का आयोजन था, जो हमारे प्रदेश में महाभारत को काव्य रुप में परम्परागत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम के पश्चात भोजन किया और रुम में आ गए। पर यहां मच्छरों की भरमार थी, मिश्रा जी से निवेदन करके इसमें हिट का स्प्रे करवाए। जिसके बाद ही आराम से सो सके। वरना सारी रात मच्छरों के बीच गुजारना कठिन हो जाता और मलेरिया लेकर घर लौटते। जारी है आगे पढें…।

कुल्टी मदद फ़ाऊंडेशन पश्चिम बंगाल में एक दिन

आरम्भ से पढ़ें 
सांसद जी से विदा लेकर आगे के कार्यक्रम के लिए चिरकुंडा होते हुए बराकर के लिए चल पड़े। इस यात्रा मे बिकास बाबू की भूमिका महत्वपूर्ण रही और धनबाद के सर्वमाननीय पत्रकार साथी मृत्यूंजय पाठक जी का भरपूर सहयोग मिला। संझा झमाझम बारिश हुई। .आज बंगाल झारखंड यात्रा का छठवां दिन था। चिपचिपाती उमस भरी गरमी से निजात पाने वतन वापसी का भी दिन था। बराकर के पास के ही कस्बे से एक इंस्ट्यूट द्वारा आमंत्रण प्राप्त हुआ था कि उनके संस्थान मे नये मीडिया पर कुछ बोलना है। सुबह नौ बजे की ट्रेन पकड कर हम कुल्टी पहुंच गये। यह कस्बा आसनसोल के समीप ही माना जा सकता है।
कुल्टी स्टेशन पश्चिम बंगाल
इस स्थान पर हमारी भेंट रबिशंकर चौबे जी से हुई। चौबे जी पेशे से पत्रकार हैं और समाजिक सरोकार रखते हुए कुल्टी मदद फाऊंडेशन चला रहे हैं। जीजिविषा के लिए फोटो स्टेट टायपिंग इत्यादि का कार्य भी करते हैं। ये कहते हैं कि यह इलाका काफी पिछड़ा हुआ है और लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसे भी नही रहते। इसके कारण बालिका शिक्षा के प्रति लोग अधिक ध्यान नही देते। परिस्थतियों को देखते हुए सिलाई मशीन प्रशिक्षण प्रारंभ किया गया इसके लिए घर की सिलाई मशीन उठाकर लाई गयी। फिर कम्प्यूटर लाए गये और कई बैच मे प्रशिक्षण कार्य प्रारंभ हुआ। 
रविशंकर चौबे जी एवं महादेव लाल जी के साथ चर्चा
पाँच वर्षो मे लगभग 2000 महिलाओ को इस संस्थान द्वारा रोजगार के लिए प्रशिक्षित किया जा चुका है। जिसमे मेंहदी, ब्यूटी पार्लर कोर्स, कम्प्यूटर, सिलाई प्रमुख है। सुबह बच्चों की शैक्षणिक समस्या को दूर किया जाता है, उसके बाद कालेज के बच्चों को अंग्रेजी प्रशिक्षण दिया जाता है। उसके बाद सिलाई की क्लास एवं सांझ को सेवानिवृत वृद्धों की महफिल जमती है। उनके लिए छोटी सी लायब्रेरी है जिससे उनका समय व्यतीत हो जाता है और बहू-पतोहू आदि के ताने खाने से राहत मिल जाती है।
कुल्टी फ़ाऊंडेशन के सदस्यों के साथ
इस सेवा कार्य के लिए धन की व्यवस्था संस्था के 8-10 सदस्य हजार पांच सौ की अपनी मासिक हिस्सेदारी से करते है। कोई भी सरकारी सहायता नही लेते। हमने 2 घंटे इन बच्चों के साथ गुजारे। बच्चो की जिज्ञासा देखकर अच्छा लगा। सभी ने धैर्य लगाकर सुना एवं प्रश्न भी किए। बच्चों ने हमे स्मृति चिन्ह भेंट किए और मैने भी इनकी लायब्रेरी के लिए कुछ पुस्तकें भेजने का वादा किया। इसके बाद हमने कुल्टी के होटल से बंगाली मिठाईयों का आनंद लिया। बिकास बाबू की बल्ले बल्ले हो गई। हमने भी एक दो टुकड़े चखे। पेट भर तो खा नहीं सकते थे।
कुल्टी फ़ाऊंडेशन के सदस्यों के साथ चर्चा
कुल्टी की बदहाली का बडा कारण इसको के प्लांट का रुग्ण होना है। इस स्टील प्लांट की स्थापना 1876 में हुई थी और यह भारत का पहला लौह अयस्क कारखाना था। इस कारखाने से ही लोगों का जीवन चलता था। राजनैतिक कारणों से यह कारखाना उपेक्षा का शिकार हो गया, जिसका खामयाजा यहां के निवासियों को भुगतना पडा। यहां से विदा लेकर हम आगे के सफर मे चल पडे। कुल्टी में हमारी मुलाकात महादेव लाल, उम्र-79 साल, निवास- अंडाल प.बंगाल से हुई थी। रेल्वे के लोको विभाग से सेवानिवृत है पेसमेकर से हृदय संचालित होता है। यही छोटा सा परिचय है इनका। पर काम बडा और प्रणम्य है। इनसे राम राम के पश्चात बात शुरु हुई तो पता चला कि ये भी महा घुमक्कड हैं। इन्होने भारत का भ्रमण सायकिल से किया है।
कुल्टी फ़ाऊंडेशन के समक्ष रविशंकर चौबे, महादेव लाल जी, बिकास शर्मा
चौंकाने वाली बात तो यह थी कि जब लोग रिटायर होकर भजन करते हुए ऊपर जाने का इंतजार करते है तब इन्होने सायकिल भ्रमण 74 वर्ष की उम्र मे प्रारंभ किया। इसे उत्कट आकांक्षा से ऊपजा दुस्साहस ही कहेगें। इनका कार्य युवाओं से लेकर जीवन के ढलान पर चल रहे लोगों के लिए भी प्रेरक है।  इन्होने यात्रा तीन चरणो मे पूर्ण की। पहली बार अंडाल से चलकर दिल्ली ऋषिकेश होते हुए लखनऊ से पुनः अंडाल लौटे। दूसरी यात्रा अंडाल से बांधवगढ होते हुए केरल तक एवं तीसरी यात्रा अंडाल से उड़ीसा छत्तीसगढ महाराष्ट्र होते हुए द्वारिका ओखा तक जाना और लौटना।
कुल्टी फ़ाऊंडेशन के सदस्यों द्वारा स्मृति चिन्ह प्रदत्त
इन यात्राओं का एक-एक दिन और घटनाएं इन्होने अपनी डायरी मे संजों रखे है। इन्होने अपना थैला क्या खोला, यात्राओं का पिटारा ही खोल दिया। बंगाली, हिन्दी, अंग्रेजी' ऊर्द अखबारों की सैकडों कतरनों के साथ हजारों फोटूएं भी दिखाई। शेर से मुलाकात एवं उडीसा के जंगलों में नक्सलियों द्वारा पैसे छीनने से लेकर अनेकों खट्टे मीठे एवं कड़ूए अनुभवों से भरी इनकी साहसिक यात्रा रही है। मैने इनसे समस्त यात्रा का वृतांत लिखने का निवेदन किया। जिससे लोक भी इनके यात्रा अनुभव से लाभ उठा सके। इनसे सुनना तो बहुत कुछ चाहता था और ये बताना भी बहुत कुछ चाहते थे। 
चलते चलते महादेव लाल जी के साथ एक सेल्फ़ी
महादेव लाल जी के पास कथा कहने के लिए पूरा समय था पर मुझ मुसाफिर के पास नहीं। आखिर हमारे आगे बढने की घडी ले आई ट्रेन सीटी बजाते हुए, एक मुसाफिर आगे चल पडा और दूसरा प्लेटफार्म पर ही रह गया अन्य किसी यात्रा की तजवीज लगाते। हमारी ट्रेन आने को थी। अगर विलंब होता तो गरीब रथ छूट सकता था। हमें झारसुगड़ा से फ़िर ट्रेन बदलनी थी। खैर समय रहते रांची पहुंच गए। गरीब रथ प्लेटफ़ार्म पर लगा हुआ था। गरीब रथ से मेरा पहला सफ़र था। इससे हम झारसुगड़ा तक आए, इसके बाद रात दो बजे मेल पकड़ कर सुबह रायपुर पहुंचे। इति।

 

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