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जंगल में भालुओं से भेंट

छत्तीसगढ़ के वनांचल में भालूओं की अच्छी खासी संख्या है। जंगल यात्रा के दौरान इनसे मुलाकात हो ही जाती है। इनके द्वारा ग्रामीणों पर हमले के समाचार मिलते ही रहते हैं। खास कर महुआ फ़ूल के सीजन में शिकायतें बढ़ जाती है। महिलाएं महुआ फ़ूल चुगने जाती हैं तो भालू उन पर हमला कर घायल कर देते हैं जिससे हमले में कईयों की तो मौत भी हो जाती है। लोगों को लगता है कि भारी भरकम दिखने वाला भालू दौड़ नहीं सकता, परन्तु भालू अड़तालिस किलोमीटर प्रति घंटा की गति से दौड़ सकता है। 
अर्जुन के वृक्ष पर भालू के पंजों के चिन्ह
भालू के पिछले पांव अगले पावों की अपेक्षा अधिक लम्बे होते हैं इसलिए वह ढाल पर तेजी से नहीं दौड़ पाता ऐसी स्थिति में वह गोल होकर लुढक जाता है। भालू को मीठे फल बहुत प्रिय हैं। शहद को भी वह बड़े चाव से खाता है। मधुमक्खी के छत्तों की खोज में वह प्राय: गाँवों में घुस जाता है। क्रोधित मधुमक्खियाँ उस पर आक्रमण करती हैं, किन्तु उसके शरीर के लम्बे, झबरे और रूखे बालों पर मधुमक्खी के डंको का कोई असर नहीं होता। 
नदी की रेत पर भालुओं के पद चिन्ह
हमारे देश में जब महुआ फूलता है, तो भालू प्रात:काल गिरे हुए फूलों को खाने के लिए आते हैं। कभी-कभी भालू स्वयं महुए के वृक्ष पर चढ़ जाते हैं, और डालियों को हिलाकर फूल गिराते हैं। जंगल भ्रमण के दौरान भालूओं से भेंट होते रहती है। पर हम यहाँ सावधान रहते हैं, भालू की उपस्थिति के चिन्हों को देखते हुए चलना पड़ता है। नदी के किनारे एवं जंगल में इनके पदचिन्ह मिल जाते हैं साथ ही जब ये शहद खाने पेड़ों पर चढ़ते है तो इनके नाखूनों के चिन्ह पेड़ों पर दिखाई देते हैं। 
जंगल में भालू
ऐसी स्थिति में इनसे बचना ही श्रेयकर रहता है। सूरजपुर के प्रेमनगर के जंगल में एक भालू ने वनकर्मी पर हमला कर उसे मौत के घाट उतार दिया। यह घटना पिछले साल 22 दिसंबर की है। भालू ने 24 घंटे के अंदर दो लोगों की जान ली थी। पेंड्रा के पास गांव में भालूओं ने हमला किया तो ये ग्रामीणों के क्रोध का शिकार बने और मार डाले गए। मानव और ग्रामीण जनों के आपसी संघर्ष की सूचनाएं मिलते रहती हैं। उपरोक्त सभी चित्र मेरे द्वारा खींचे गए हैं।

जतमई में नैसर्गिक सौंदर्य का आनंद

छत्तीसगढ़ में गरियाबंद जिले के छुरा ब्लॉक अंतर्गत जतमई नामक प्राकृतिक झरना है। हरितिमा से आच्छादित पहाड़ी से यह झरता हुआ यह झरना बरसात के दिनों में सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र होता है। रायपुर से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर होने के कारण शहर एवं आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों के सैलानी सप्ताहांत में यहाँ पहुंच जाते हैं और जतमई माता के दर्शन के साथ झरने में जलकिलोल करने का लुफ़्त उठाते हैं। 

रविवार के दिन तो यहाँ पर रेलमपेल मची रहती है। वनक्षेत्र के रमणीय वातावरण का आनंद इस स्थान पर लिया जा सकता है। वनांचल में प्राकृतिक झरना होने के कारण कुछ वर्षों से पर्यटकों की बड़ी संख्या इस स्थान पर मनोरंजन के लिए पहुंचती है, इसके साथ ही वनदेवी जतमई के दर्शन करने के लिए भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। वैसे तो जतमई का बरसाती झरना जुलाई से दिसम्बर तक ही रहता है। नववर्ष के दिन पिकनिक मनाने वालों का भीड़ अत्यधिक रहती है।


ग्राम पटेवा के निकट यह स्थान होने के कारण स्थानीय लोग एक समिति बनाकर इस स्थान का विकास कर रहे हैं। यह झरना 70 फ़ुट की ऊंचाई से गिरता है। यहां विशालकाय चट्टाने एक के ऊपर एक इस तरह से रखी हैं कि लगता है किसी कुशल कारीगर ने इन्हें स्थापित कर दिया हो। जतमई मंदिर के निकट सिद्ध बाबा का प्राचीन स्थान है, यहां पर एक चिमटा रखा हुआ है। कहते हैं कि इस स्थान पर 400 बरस पहले कोई सिद्ध बाबा रहते थे। उनके कारण इस स्थान की मान्यता अधिक हो गई। 


यहीं पर एक शेर माड़ा भी है, जिसे लोग शेरगुफ़ा कहते हैं। पहले इस स्थान पर जंगली जानवर भी बड़ी संख्या में रहते थे। भालुओं की आमदरफ़्त तो अभी भी रहती है। शहर के समीप रविवारिय मनोरंजन के लिए यह एक आदर्श प्राकृतिक स्थल है। इस स्थान का सौंदर्य देखने लायक है। एक बात गौर करने लायक यह भी है कि अत्यधिक पर्यटकों के पहुंचने के कारण इस स्थान पर प्लाटिक की पन्नियों, खाने की सामग्री के रैपरों एवं पर्यटकों द्वारा फ़ैलाई गई गंदगी के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। प्लास्टिक के सामानों पर यहां प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

 

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