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बुद्धा टॉप - भूटान यात्रा -7

दिन अभी ढलने में कुछ घंटे बाकी थे। हमारी सांझ की सैर भूटान के राष्ट्रीय संग्रहालय से प्रारंभ होने वाली थी। थिम्पू चू के किनारे चलते हुए हमारी बस घाटी के दूसरी तरफ़ स्थित एक पहाड़ी की ओर चल पड़ी। थिम्पू चू का पानी एक दम साफ़ था। यह नदी यहाँ पर उथली है और इसके दोनो तरफ़ ही नगर बसा हुआ है। पहाड़ी पर संग्रहालय बना हुआ है। इसमें प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति 25 रुपए है। संग्रहालय के कर्मचारी जल्दी कर रहे थे क्योंकि 5 बजे संग्रहालय बंद होने का समय है। सभी ने शुल्क देकर टिकिट ली और संग्रहालय में प्रवेश किया। संग्रहालय में कुछ खास तो दिखाई नहीं दिया। परन्तु भूटानी संस्कृति एवं उसके कुछ योद्धाओं के विषय में जानकारी अवश्य मिली। इसके पश्चात हम बाजार की ओर चल पड़े।

राष्ट्रीय संग्रहालय थिम्पू भूटान
भूटान का बाजार भारतीय एवं चीनी सामानों से अंटा पड़ा है, भारतीय सामान कोलकाता के रास्ते यहाँ तक पहुंचता है और चीनी सामान नेपाल होते हुए सिलीगुड़ी के रास्ते भूटान के बाजारों तक आता है। गर्म कपड़े यहाँ पर अच्छे मिलते हैं, खासकर चमड़े एवं रैग्जिन की जैकेटें काफ़ी उम्दा है, लेकिन इनका मूल्य भी आम आदमी की पहुंच के बाहर है। जूते भी कई रंगों के मिलते हैं, विशेषकर महिलाओं एवं बच्चों के। हिमालय क्षेत्र का देश होने के कारण यहाँ पैरों को गर्म रखने के लिए जूते अनिवार्यत: पहने जाते हैं। थिम्पू का यह बाजार मुझे मंहगा लगा। इस बाजार में वस्तुओं के मूल्य पर्यटक स्थलों की तरह ही कुछ अधिक हैं। यहाँ की अधिकतर दुकानदार महिलाएं ही हैं।
पारो का बाजार
दो-तीन घंटे बाजार की सैर करके जब हम बस के समीप पहुंचे तो कई सदस्य बस तक नहीं पहुंचे थे। बाजार में ही घूम रहे थे। एक घंटे से अधिक खड़े होने के कारण ड्रायवर को 50 रुपए पार्किंग चार्ज देना पड़ा। इसलिए इनके विलंब को लेकर वह बड़बड़ाने लगा और सबसे 100 रुपए इकट्ठे करके देने को कहने लगा। कल भी उसने ही पार्किंग चार्ज दिया था। मेरी हल्की फ़ुल्की उससे बहस भी हो गई। किसी तरह सबके लौट आने पर हम रिजोर्ट में लौट आए। जो भूटान का सिम हमने खरीदा वह किसी काम नहीं आ रहा था। फ़ोन कभी लगता था कभी नहीं। लौट कर आने के बाद उसके बैलेंस के 200 रुपए मैने घर बात करके खत्म कर दिए।
संग्रहालय में भूटानी सिपाही
रात सबको भोजन के वक्त बता दिया गया था कि उन्हें सुबह जल्दी तैयार होकर पारो के लिए चलना है और इसी रास्ते में पड़ने वाले कुछ स्थानों की सैर कराई जाएगी। बस इसे ही ध्यान में रख कर हम सुबह जल्दी उठ गए।  सभी ने तैयार होकर अपने सामान बस में लाद दिए और बस पारो के लिए चल पड़ी। हमारी बस सबसे पहले भूटान के चिड़ियाघर पहुंची। यहाँ पर कुछ पैदल चलना पड़ता है। लगभग आधा किलोमीटर पैदल चलने के पश्चात तारों की फ़ेंसिग से घिरा एक बाड़ा दिखाई दिया जिसमें भूटान का राष्ट्रीय पशु "टाकिन" रखा गया था। इसका पीछे का आधा हिस्सा गाय जैसा एवं सिर बकरे के जैसा है। ऐसा लगता है किसी ने गाय और बकरे को जोड़ दिया हो।
बस के यात्री
ऐसा जानवर मैं पहली बार देख रहा था। इसके विषय किंवदन्ती है कि सन् 1455 के आसपास एक चमत्कारी लामा जी को एक दिन गाय और बकरी की हड्डियां बिखरी पड़ी मिली। उन्हें चमत्कार दिखाने को कहा गया। लामा ने बिखरी हड्डियों को जोड़कर उन पर प्राण का संचार किया तो वह टाकिन बन कर जंगल में भाग गया। ये टाकिन उसी के वंशज बताए जाते हैं। इस लामा के चमत्कार की कई कहानियां बताई जाती हैं। इस प्रकार उत्तरी भूटान के जंगलों में टाकिन पाया जाता है तथा इसके नाम पर ही भूटान की रेड वाईन का नामकरण किया गया है। इसके मैने कई फ़ोटो लिए और हम वापस बस में लौट आए। 
भूटान का राष्ट्रीय पशु - टॉकिन
इसके बाद हमारी बस शहर में ही बने एक मंदिर चंगघा ल्हाखंग में पहुची। इसे लोग हनुमान मंदिर भी कह रहे थे। यहाँ लोग अपने बच्चों के स्वास्थ्य की कामना करते हुए लामा से आशीर्वाद दिलाने आते हैं। इसके बाद हम वांगचुग मेमोरियल पहुचे। यहाँ पर हमें हिन्दी भाषी श्री लंका में शिक्षित भूटानी गाईड कुमार मिला। उसने बताया कि इस स्मारक को तीसरे राजा ड्रूक ग्यालपो किंग जिग्मे दोरजी वांगचुक की याद में उसकी माता रानी फ़ुंत्शो चोदेन वांगचुक ने 1974 में बनवाया था यह स्मारक बहुत ही सुंदर है। इसमें भूटानी संस्कृति की झलक दिखाई देने के साथ अपने राजा के प्रति अथाह सम्मान भी दिखाई देता है। इस अवधि में मुझे भूटान में एक भी भिखारी नहीं दिखाई। नहीं कोई पैसे लिए हाथ फ़ैलाते दिखा। 
पुण्यार्थी - शुभदा पाण्डे, कुसुम वर्मा, डॉ नित्यानंद पाण्डे, रविन्द्र प्रभात, कृष्णकुमार यादव, मनोज पाण्डे
इस मंदिर से हम लोग बुद्धा टॉप की सैर पर चले। इस पहाड़ की चोटी पर चीन सरकार के सहयोग से भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध (शाक्य मुनि) की 169 फुट (51.5 मीटर) ऊंची प्रतिमा विशाल कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है। अवश्य ही कुछ वर्षों के बाद यह स्थान भूटान टुरिज्म का एक लैंड मार्क बनकर तैयार होगा तथा भूटान को पहचान दिलाएगा। बुद्ध की कांस्य प्रतिमा यहाँ पर आकाश से होड़ लगाती दिखाई देती है। इसके समक्ष बहुत बड़ा मैदान है जिसमें टाईल्स बिछाने का काम चल रहा था। यात्री दल ने यादगार के लिए यहाँ पर कई चित्र खींचे एवं खिंचवाए। इस स्थान पर अगर बगीचा बना दिया जाता और उसमें कुछ फ़ूल एवं फ़ल के वृक्ष लगा दिए जाते तो यह स्थान काफ़ी मनोरम हो जाएगा। अब यहाँ से हमारा अंतिम पड़ावा पारो था। जहाँ हमें एक रात व्यतीत करनी थी।
भूटान यात्रा दल बुद्धा टॉप में
बुद्धा टॉप से हम चल पड़े पारो की ओर, अभी तक का सफ़र सुनीता दो लाईनर कविताओं के साथ कट गए। कृष्णकुमार यादव जी एवं कुसुम वर्मा जी इसमे पूर्ण रुपेण सहभागी बनी थी। पप्पू अवस्थी जी खड़े खड़े इसे रिकार्ड कर रहे थे। उन्हें रिकार्डिंग में आनंद आ रहा था और मुझे सुनीता की कविताओं में तीसरी लाइन जोड़ने का मजा आ रहा था। इस तरह सफ़र मजे से कट रहा था। लम्बे सफ़र की यही मौज है कि बोलते बतियाते कट जाता है और यदि कवि, लेखक या गायक कलाकारों का संग हो तो तख्ते लंदन तक का सफ़र बस में कट जाएगा। अब एक यात्रा ऐसे ही मित्रों के साथ शिप में अंडमान की करनी है जहाँ सारे रास्ते भर कविताएं बरसती रहेगीं।

मोक्षार्थियों द्वारा लिंग पूजा की परम्परा………… भूटान यात्रा - 6

थिम्पू में होटल ताज के सामने भूटान की स्ट्रीट मार्केट है। जहां भूटान के हस्त शिल्प की झलक मिलती है तथा हस्त शिल्प की बिक्री भी होती है। सभी दुकानदार महिलाएं ही हैं और आगे की कहानी इसी स्ट्रीट से प्रारंभ होती है। मैने देखा की इन दुकानों में विभिन्न तरह से सजाए हुए एवं बिना सजावट के भी "पुरुष लिंग" विक्रय के लिए रखे हुए थे। इस तरह खुले आम दुकानों में सामने रख कर पहली बार मैंने कहीं लिंग बिकते देखे। साथ में घूम रही भारतीय महिलाएं एवं पुरुष देख कर झिझक रहे थे। हमारे यहाँ सेक्स को टैबू समझा जाता है। यह प्रदर्शन की वस्तु नहीं मानी जाती और सेक्स से संबंधित चर्चा भी करना वर्जित समझा जाता है। इस तरह खुले आम लिंगों की बिक्री देख कर मेरी जिज्ञासा बढी और मैने दुकानदारों से इस विषय में चर्चा करना उपयुक्त समझा। उनसे ही सही जानकारी मिल सकती थी। 

भूटानी नाम मुझे बड़े कठिन लगे, याद ही नहीं रहते इसलिए दुकानदार का नाम तो मुझे याद नहीं पर उसने बताया कि उनके यहाँ लिंग की पूजा होती है। प्रतीक के रुप में छोड़े लिंगविग्रह से लेकर बड़े बड़े लिंग बनाए जाते हैं। आंखों वाले लिंग एवं मानवाकृति में दाढी मूंछ वाले लिंग बनाए जाते हैं। ड्रेगन जैसे लिंग भी मिलते है। इन्हें कपड़े आदि पहना कर सजाया जाता है तथा रिबन से बांधा जाता है, जैसे कोई गिफ़्ट आयटम बांधा जाता है। भूटान में लिंग को सृजन का कारक एवं रचनात्मक सकारात्मक उर्जा का प्रतीक माना जाता है। प्रत्येक घर में इसे रखा जाता है। घर के द्वार के दोनों तरफ़ लिंग चित्रित किए जाते हैं। इनके चित्र बड़े ही कलात्मक एवं सुंदर ढंग से चटक रंगों से तैयार किए जाते हैं। इन्हें सुख समृद्धि का द्योतक माना जाता है। भूटानी लिंग को अपने घरों में इसलिए टांगते हैं कि बुरी आत्माओं से बचाव होता रहे एवं मर्दों में सेक्स की क्षमता में इजाफ़ा हो।

लिंग पूजन तो भारत में लगभग 8 वीं 9 वीं शताब्दी से हो रहा है। हमारे यहां लिंग योनिपीठ में स्थापित होता है। लिंग एवं योनि दोनों की ही पूजा होती है। इसके साथ ही वाममार्ग में जननांगों की पूजा का विशेष महत्व है। पंच मकारों में मैथुन को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा इसे मोक्ष का साधन माना गया है। "मद्यं मांसं मीनं मुद्रां मैथुनं एव च, ऐते पंचमकार: स्योर्मोक्षदे युगे युगे।" भूटान हमारा पड़ोसी देश है जो हमारी धरती से भी जुड़ा हुआ है। किसी जमाने में सुदूर देशों से भी विद्याथी, विद्याध्ययन के लिए भारत आते थे। ऐसे में यहाँ के संस्कारो एवं संस्कृति का भी विशेष प्रभाव उन पर पड़ता ही होगा और वाममार्गी लिंग पूजन इसी रास्ते से भूटान पहुंचा होगा। ऐसी मेरी मान्यता है।

यहाँ से खोज-बीन आगे बढ़ती है तो पता चलता है कि मनुष्य ने सेक्स के जरिए मोक्ष का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया। मोक्ष मिला या नहीं। इसकी तो कहीं जानकारी नहीं मिलती पर सेक्सजनित रोगो से परलोक अवश्य सिधार गए होगें। वाममार्गियों से लेकर आचार्य रजनीश तक ने सेक्स के माध्यम से मोक्ष का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया और इस पर खुली चर्चा भी की। संभोग से समाधि तक उनका प्रवचन भी काफ़ी प्रसिद्ध रहा तथा युवाओं में यह प्रवचन चर्चित भी रहा। ऐसे ही एक संत 500 वर्ष पूर्व भूटान में भी हुए। भूटानी संत द्रुकपा कुनले का भी मानना था कि सेक्स के माध्यम से मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। कहते हैं इस संत ने 5000 महिलाओं से यौन संबंध स्थापित किया।

कुनले का जन्म 1455 में तिब्बत के पश्चिमी क्षेत्र सांग में बौद्ध धर्म के ग्या वंश के रालुंग मांनेस्ट्री में हुआ था। उसे कुनगा लेगपाई जैगपो के नाम से भी जाना जाता है। उसके पिता का नांग सो रिन चेन जांग पो थे। दंतकथा के अनुसार कुनले में दुष्टों को भी रक्षा करने वाले देवताओं में बदल देने की शक्ति थी। वह मात्र अपने लिंग को छुआकर ऐसा करिश्मा कर दे्ता था। कुनले के लिंग को थंडरबोल्ड ऑफ फ्लेमिंग विजडम कहा जाता था। कुनले का दावा था कि वह पुरोहितों के पाखंड को दूर करना चाहता है। वह शराब पीकर मस्त रहने के समर्थक था। दुनिया के कई देशों से महिलाएं उसका आशीर्वाद पाने के लिए इस विचित्र बौद्ध संन्यासी के मठ में आती थीं। उसने बहुत ही कम समय में बड़ी ख्याति प्राप्त कर ली थी। संन्यासी कुनले के उपदेश का प्रभाव आज भी हमने भूटान में देखा, यहां विभिन्न तरह के लकड़ी से बने हुए लिंग दिखाई देना कुनले की ही परम्परा है।

भूटान के लोगो के अनुसार बौद्ध धर्म में जन्म लेकर कुनले ने अपनी एक अलग शाखा बना ली बौद्ध मत के अन्दर जो कि लिंग कि पूजा किया करते थे। कुनले सबको एवं खासकर स्त्रियों के साथ सेक्स करके उन्हें आशीर्वाद दिया करता था। वह तिब्बत, भूटान आदि देशों में घूम घूमकर स्त्री और कन्याओ का कौमार्य तोड़ता था और सबके साथ सेक्स करता था। उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण लोगो ने उसके सम्मान में उसका एक मंदिर भी बना दिया। कुनले  ने एक बुरी, मांसभक्षी स्त्री के साथ सेक्स कर उसका गर्भ ठहरा दिया था जिसका मंदिर भी कुनले के साथ ही बनाया गया है।

लोगो के अनुसार कुनले स्त्री प्रेमी था और हमेशा उनका भला चाहता था.. आज भी भूटान के लोग उसके मंदिर में जाते हैं और वहां भिक्षु उनको पुरुष लिंग से आशीर्वाद देता है ताकि उनकी सेक्स लाइफ अच्छी चलती रहे। इस तरह हमने भारतीय वाममार्गी दर्शन का प्रभाव कुनले के माध्यम से भूटान में भी देखा। जो सेक्स के माध्यम से मोक्ष प्राप्त कराना चाहता था और भूटान में आज भी पूजनीय है और परम्परा में समाहित होने के कारण यह लिंग पूजा सहत्राब्दियों तक चलते भी रहेगी। भले ही विदेशियों के लिए भूटान में सार्वजनिक रुप से लिंग प्रदर्शन कौतुहल का कारक बनता हो परन्तु भूटानियों के लिए सामान्य जन-जीवन का एक हिस्सा है। जारी है …… 

 

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