शनिवार, 16 दिसंबर 2017

सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था वेंटीलेटर पर

शिक्षाकर्मियों की हड़ताल हुई और सारी शैक्षणिक व्यवस्था वेंटीलेटर पर चली गई। शिक्षा सत्र के मध्य में विद्यार्थियों की पढाई का नुकसान हुआ। सरकारी स्कूलों में पढाई के प्रति न सरकार गंभीर है, न शिक्षक।

शिक्षा सत्र आरंभ होने की सुगबुगाहट के साथ सरकार और मीडिया सभी एकाएक जाग उठते हैं, अखबार शिक्षा व्यवस्था की खामियाँ गिनाने लगते हैं तो सरकार गुणवत्ता सुधारने की कवायद का बखान करने लगती है।

आनन-फ़ानन में दो-चार आदेश जारी करने के बाद कर्तव्यों की इति श्री हो जाती है और व्यवस्था अपने उसी ढर्रे पर चलने लगती है। एक तरफ़ देखें तो सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं में पढाई का स्तर नित्य ही गिरते जा रहा है, जिसके कारण निजी संस्थाएं चाँदी काट रही हैं।

कई संस्थाएं तो इतनी ऊंची पहुंच रखती हैं कि वे शासन के आदेशों की धज्जियां उड़ा कर अवमानना करते हुए मनमानी फ़ीस बढा कर अपनी मनमानी करते हैं। 

शिक्षा नित मंहगी होते जा रही है, अगर कहें तो आम आदमी के पहुंच के बाहर हो रही है। विद्यार्थी को नामी शिक्षण संस्था में प्रवेश दिलाने के लिए पालक का दम निकल जाता है। जिधर देखो उधर ही शिक्षा की दुकाने सजी हुई हैं।

सरकारी स्कूलों में कोई अपने बच्चे को पढाना नहीं चाहता। हर पालक चाहता है कि उसका बच्चा अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढे। उच्च शिक्षा के लिए सरकारी महाविद्यालयों में उतना कोटा नहीं है जितने विद्यार्थी हैं। इसलिए इन्हें मजबूरन निजी शिक्षण संस्थाओं में मोटी फ़ीस देकर पढाई करनी पड़ती है। जिसका बोझ परिवार पर अतिरिक्त पड़ता है। 

जिसके पास काला-पीला धन या टेबल के नीचे की कमाई है, वह अपने बच्चे को निजी संस्थाओं में पढा लेता है, परन्तू उनका मरण हो जाता है जिनके पास बड़ी फ़ीस देने के लिए धन नहीं है। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के नाम पर नित नए प्रयोग होते दिखाई देते हैं।

नई सरकारें सत्ता में आती हैं तो पाठ्यक्रम बदल दिया जाता है। वामपंथ, दक्षिणपंथ, उत्तरपंथ इत्यादि पथों का प्रभाव पाठ्यक्रम पर डालने का कार्य किया जाता है। जिसका असर विद्यार्थियों के मानस को दुषित करने के साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता को हानि पहुंचाता है। 

निजी स्कूलों के पीछे दीवानगी आलम यह है कि नेता, अधिकारी, कर्मचारी एवं सरकारी स्कूलों के शिक्षक अपने बच्चे को निजी स्कूलों में पढाना चाहते हैं। सरकारी तंत्र की अंतिम इकाई चपरासी का बच्चा भी आपको निजी स्कूलों में पढाई करता मिल जाएगा।

जो संस्था उन्हें रोजी-रोटी, रोजगार दे रही है, उसकी गुणवत्ता एवं कार्यक्षमता पर ही संदेह है। यही कारण है कि आम आदमी भी अपने बच्चे को निजी शिक्षण संस्थाओं में पढाना चाहता है क्योंकि सरकारी संस्थाओं की शिक्षा में लोगों को विश्वास नहीं रह गया और जनता में यह अविश्वास स्वयं कर्ताधर्ताओं ने फ़ैलाया है। 

अब स्पष्ट दिखाई देता है कि समाज में दो वर्ग पैदा हो गए हैं, एक वह जिसे अंग्रेजी बोलकर शासन करना है तथा दूसरा वह जिसे हिन्दी बोलकर जी हजूरी करनी है। शासक एवं शासित का विभाजन स्पष्ट दिखाई देने लगा है। यह खाई दिनों दिन और भी गहरी होती जानी है। इसका समय रहते उपचार करना होगा।

सरकार ने गरीब बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढाने की दिशा में आर टी आई एक्ट लागु किया है। जिसके तहत गरीब बच्चों को भी मंहगे निजी स्कूलों में पढाई करने का अवसर मिलेगा। प्रश्न यह उठता है कि कितने गरीब इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। सभी को निजी स्कूल दाखिला देने से रहे। 

शिक्षा में गुणात्मक सुधार लाने एवं धरातल पर अमीर गरीब की खाई मिटाने के लिए पहल करनी होगी। हमारे पास सरकारी स्कूलों के रुप में बहुत बड़ा अमला है, भवन हैं, अन्य सुविधाएँ भी दी जा रही है। परन्तू इनके प्रति लोगों का विश्वास खत्म हो रहा है। इस विश्वास को पुन: जगाना होगा।

यह प्रयोग केरल के एक कलेक्टर ने किया, उसने अपनी बेटी को सरकारी स्कूल में भर्ती कराया, जिससे सभी शिक्षक समय पर स्कूल आने लगे। नियत विषय को ईमानदारी से पढाने लगे। इससे उस स्कूल में शिक्षा का स्तर सुधरा। 

शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए सरकार को कड़ा कदम उठाकर एक आदेश अपने सभी मंत्रियों , विधायकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को देना चाहिए कि वे अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में ही पढाएँ। इसका सकारात्मक प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा और गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। यह शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम होगा तथा इससे सामाजिक सद्भवाना का पाठ विद्यार्थी होश संभालते ही पढने लगेगा.

जब मंत्री एवं आम आदमी तथा कलेक्टर और चपरासी के बच्चे एक ही स्थान पर बैठकर पढाई करेगें। शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों से बड़ी लकीर खींचनी होगी अन्यथा शिक्षा के नाम पर ढोल पीटना बेमानी है। 

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

गणपति का समर्पित पूजारी : सिरती लिंगी अरुणाचल

डिब्रुगढ़ असम से तिनसुकिया होकर रोइंग अरुणाचल का सफ़र लगभग पांच घंटे का है। ब्रह्मपुत्र पर दस किमी लम्बा पुल बन जाने के कारण यह दूरी जल्दी तय होने लगी वरना यहाँ पहुंचने के लिए दिन भर लग जाता था। रोइंग लोवर दिबांग वैली का जिला मुख्यालय भी है। 
इन्जानो लोवर दिबांग वैली अरुणाचल का गणपति मंदिर एवं टिकेश्वर कौशिक 
यहाँ के विवेकानंद केन्द्र विद्यालय में रात रुकने के बाद हम सुबह मोटरसायकिल से सुनपुरा (लोहित) जिले की ओर चल दिए। रास्ते में रोईंग से लगभग 15 किमी की दूरी पर नदी पार करने पर अनोबोली इंजनों नामक गांव आता है। इस गांव के निवासी श्री सिरती लिंगी जी ने अपने फ़ार्म हाऊस में गणेश जी का मंदिर बना रखा है। 

इनकी चर्चा करना इसलिए आवश्यक है कि अरुणाचल में जिस तरह क्रिस्तानी विस्तार हो रहा है और गांव के गांव क्रिस्तानी हो गए उसके बीच सनातन धर्मी का मिलना नखलिस्तान में पानी की एक बूंद मिलने जैसा है। हम इनके संतरे फ़ार्म हाऊस में पहुंचे तब सिरती लिंगी जी पूजा पाठ में लगे थे। 
सिरती लिंगी गणपति भक्त 
अरुणाचल में सूर्योदय जल्दी हो जाता है तथा सूर्यास्त भी शाम चार बजे के लगभग। इसलिए यहां यात्रा जल्दी ही प्रारंभ करनी होती है। सिरती लिंगी जी के मंदिर में पहुंच कर गणपति भगवान के दर्शन किए और उन्होंने केले का प्रसाद दिया, तिलक किया और रक्षा सूत्र भी बांधा। 

चर्चा होने पर उन्होंने बताया कि इस फ़ार्म हाऊस को उन्होंने बेच दिया था। खरीदने वाले ने जब यहाँ खुदाई प्रारंभ की तो लगभग चार फ़ुट की गणेश प्रतिमा जमीन से बाहर निकली। जब इन्हें पता चला तो जिसे जमीन बेची थी उसे लौटाने की प्रार्थना की और दुगनी कीमत में जमीन वापस खरीदी। इसके पश्चात यहाँ मंदिर बनवाया।
उत्खनन में प्राप्त गणपति 
मंदिर बनाने के पश्चात लगभग पचीस वर्ष पूर्व सिरती लिंगी जी गणपति का पूजा विधान सीखने मुंबई गए। उन्हें पता चला था कि महाराष्ट्र में गणपति पूजा अधिक की जाती है। मुंबई जाकर वहाँ के पुजारियों से तीन महीने गणपति पूजा विधान सीखा और अध्यात्म की दीक्षा ली। इसके पश्चात यहाँ लौटकर विधि विधान से नित्य गणपति पूजा करते हैं।

सुबह चार बजे अपनी कार से फ़ार्म हाऊस पहुंचते हैं, मंदिर की धुलाई पोंछाई खुद ही करते हैं। इसके पश्चात मंत्रोच्चारण के साथ पूजा करते हैं तथा दिन भर मौन रहकर ध्यान साधना करते हैं। शाम की आरती एवं भोग लगाने के बाद चार बजे मंदिर बंद कर घर चले जाते हैं। पच्चीस वर्षों से यही इनकी नित्य की दिनचर्या है।
रक्षा सूत्र बांधते हुए सिरती लिंगी 
प्रतिमा शिल्प से उत्खनन में प्राप्त गणेश जी पन्द्रहवीं सोलहवीं शताब्दी की प्रतीत होती है। इन्होंने बताया कि जब उन्होंने मंदिर बनवाकर पूजा प्रारंभ की तो उनके रिश्तेदारों ने बहुत परेशान किया कि तुम हिन्दू हो गए हो, यह ठीक नहीं है। विभिन्न तरीकों से दबाव बनाने का प्रयास किया पर वे विचलित नहीं हुए और अपनी पूजा निरंतर जारी रखी। 

इनके मंदिर में स्थानीय लोग नहीं आते, बाहर से आने वाले लोग ढूंढ कर इस स्थान में पहुंचते हैं। सिरती लिंगी जी के परिवार ने मांस मंछली, प्याज लहसून आदि तामसिक पदार्थों का सेवन छोड़ दिया और कहते हैं कि इसका सेवन करने वालों से वे बात भी नहीं करते और दूर से ही नमस्ते कर लेते हैं। शाकाहार के विषय में कहते हैं कि शेर मांस खाता है तो उसकी उम्र 30 बरस होती है और हाथी शाकाहार करता है तो उसकी उम्र 100 बरस से अधिक होती है इसलिए शाकाहार में अधिक शक्ति है।
सिरती  लिंगी एवं लेखक 
सावन के महीने में माह भर ये मौन व्रत के साथ उपवास रखते हैं एवं शाम को सिर्फ़ फ़लादि का सेवन करते हैं। इनकी उम्र 70 वर्ष है और इनके दो बेटे इंजीनियर है, जो बाहर रहते हैं। गणपति भगवान ने इन्हें बहुत कुछ दिया, वरना ये बहुत गरीब थे। आज इनके पुत्रों का पचीस तीस लाख का पैकेज है और गणपति आराधना करते हुए समय व्यतीत हो रहा है। 

लौटते हुए जब हम इनसे पुन: मिलने आए तो संझा आरती पूजा की तैयारी कर रहे थे। मंदिर में ही इन्होंने स्वच्छ जल का कुंड बना रखा है। जिसमें गंगाजल डाला हुआ एवं उसी जल का प्रयोग पीने एवं भोजन बनाने में किया जाता है। हमें भी उसी कुंड का जल पिलाया और फ़िर पूजा की तैयारी करने लग गए। हमें भी अंधकार में एक उजाले की किरण दिखाई दी और प्रणाम कर आगे बढ़ गए।

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

दोगला : शब्द चिंतन ( ललित निबंध)

दोगला एक ऐसा शब्द है जिसका प्रचलन धड़ल्ले से होता दिखाई/सुनाई देता है। दोगला आदमी, दोगली राजनीति, दोगली बात, दोगला नेता, दोगली स्त्री इत्यादि बहुधा प्रयुक्त होता है। वर्तमान में यह शब्द धोखा देने वाले, दो मुंही बातें करने वाले, अविश्वसनीय व्यक्ति के लिए संदर्भ में लिया जाता है। 

जबकि भारत में पानी उलीचने की बांस कमचियों से बने टोकरे लिए दोगला शब्द संज्ञा के तौर पर प्रयुक्त होता है। इसे हिन्दी वांग्मय का शब्द माना जाता है। परन्तु यही शब्द फ़ारसी में पहुंच कर घातक होकर लड़ाई झगड़े की जड़ गाली बन जाता है तथा अर्थ बदलकर वर्णसंकर, जारज (प्रेमी/उपपति/आशिक से उत्पन्न होने वाला) हो जाता है।

शब्द की महिमा अपरम्पार है तथा पूर्व प्रचलित एकार्थी शब्द कालांतर में बहुअर्थी हो जाता है। जिस मानक अर्थ में प्रयुक्त होने के लिए शब्द ने जन्म लिया, कभी कभी तो उसके विपरीत अर्थ में भी प्रयुक्त होने लगता है। जैसे सम्भ्रांत - सम+भ्रांत। जो दशों दिशाओं से याने सब तरफ़ से विचलित (पागल) हो गया हो (निरुक्त) उसे सम्भ्रांत कहा गया। परन्तु वर्तमान में इसका प्रयोग कुलीन के समानार्थी होने लगा। किसी परिवार या व्यक्ति को सभ्य बताने के लिए इस शब्द का प्रयोग होता है। 

लोकप्रचलित हिन्दी भाषा में विभिन्न भाषाओं के शब्दों को सहज स्वीकार किया गया है, वे अब इतने अधिक घुलमिल गए हैं कि पता ही नहीं चलता किस भाषा से इन शब्दों की व्युत्पति हुई है। अरबी, फ़ारसी, उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्द हिन्दी प्रवेश कर इतनी प्रतिष्ठा प्राप्त कर गए हैं कि वार्तालाप या लेखन के समय कोई इनके समानार्थी शब्द भी नहीं ढूंढता एवं सहजता के साथ समाज भी स्वीकार लेता है। 

दोगले से मिलाजुला एक शब्द और है हरामजादा, इसका प्रयोग भी गाली के तौर पर होता है। इसका शाब्दिक अर्थ है हरम में जन्म लेने वाला। मुगल बादशाहों के हवसगाह होते थे हरम। जिसमें हजारों स्त्रियाँ रखी जाती थी। रखैल (रखी हुई) शब्द भी यहीं की व्युत्पत्ति है। इन स्त्रियों से जन्म लेने वाले हरामजादे कहे जाते थे। हरामजादे शब्द संज्ञा है, जब यही शब्द प्रवृत्ति बन जाता है तो हरामजदगी हो जाता है अर्थात जिसके स्वभाव में ही जन्म से दोगलापन है। 

हरामजादा या दोगला शब्द के अर्थ में संस्कृत में जारज: शब्द प्रयुक्त होता है। जार: (जारयति इति जृष् वयोहानौ धातौ: धञ, णिलुक् च) उपपति: (उपमित: पत्या) ये दो पुल्लिंग नाम मुख्य से भिन्न अप्रधान पति (यार) के हैं। अमृते भर्तरि जारज:, मृते भर्तरि जारजो गोलक:। (अमरकोश) जार से उत्पन्न संतान को जारज कहा गया है। इस तरह हम देखते हैं कि संज्ञा के लिए प्रयोग होने वाले शब्द प्रवृत्ति के रुप में प्रयुक्त होते हुए विशेषण बन गये और विशेषता बताने/जताने के लिए प्रयुक्त होने लगे तथा गाली के रुप में प्रतिष्ठित हो गए।

राम मनोहर लोहिया जी का कहा स्मरण हो आता है  कि तन का दोगला एक बार चलता है पर मन का दोगला घातक होता है अर्थात मन के दोगले को अधिक घातक बताया गया। मन का दोगला होना व्यक्ति की प्रवृत्ति हो गई। दोगला शब्द वर्तमान में प्रवृत्ति बन गया। वर्तमान समय में दोगले शब्द ने अन्य अर्थ ग्रहण कर लिया। अब इसका अर्थ 1. दो तरह की बातें करने वाला 2. जिसकी कथनी और करनी में विसंगति हो, में बदल गया। 

समाज में ऐसे मनुष्य (स्त्री/पुरुष) भी रहते हैं जिनकी कथनी और करनी में विसंगति होती है। ये मुंह के सामने मीठी-मीठी मुंह चोपड़ी बातें करते हैं और पीठ पीछे षड़यंत्र करने से बाज नहीं आते, मौका पाकर खंजर भी चला देते हैं। ऐसा नहीं है कि इनमें कोई दोष है, यह इनकी जन्मजात प्रवृति है, जो दिनचर्या में सम्मिलित है। दोगलई किये बिना ये रह ही नहीं सकते। ये व्यक्ति, समाज, देश, राष्ट्र किसी के साथ भी दोगलाई कर सकते हैं। इनकी दोगलाई की कोई सीमा चिन्हित या तय नहीं है।

मनोवैज्ञानिकों ने अनुभव किया कि कुछ लोग परिस्थितिवश दोगलई करना चाहते हैं, परन्तु कर नहीं पाते। क्योंकि उनकी प्रवृत्ति में नहीं है। प्रवृत्ति में होने के कारण सहजता होती है तथा प्रवृत्ति में न होने के कारण कृत्रिमता असहज कर देती है। और वे अपनी दोगलई को स्वत: ही प्रकट कर देते हैं। क्योंकि कबीर दास जी ने कहा है "सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदय सांच हें, वाके हिरदय आप॥" कहीं न कहीं उसके हृदय में आप है जो उसे दोगलई करने से रोक देता है। 

इतिहास में देखते हैं कि बहुत सारे राजे-महाराजे, यति-जति दोगलों की भेट चढ़ गए तथा वर्तमान में भी चढ़ रहे हैं। ऐसा नहीं है यह प्रजाति सिर्फ़ भारत में ही पाई जाती है। युरोप का उदाहरण हम ले सकते हैं, यीशु ने मनुष्यों को सन्मार्ग बताने में अपना सारा जीवन व्यतीत कर दिया। जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया तो कहा- हे पिता (ब्रह्म), इन्हें माफ कर दे (जिन्होंने सूली पर चढ़ाया था) क्योंकि इन्हें नहीं मालूम है कि ये क्या कर रहे हैं। 

दोगले लोगों को ढूंढने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, वे आस-पास ही पाए जाते हैं, जो निकटस्थ होकर अपनी करनी करने तैनात रहते हैं। यीशु को सूली पर चढाने वाले दोगलई प्रवृत्ति से ग्रसित लोग थे। इसलिए यीशु ने उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना की। पर हर आदमी संत नहीं होता। लौकिक जीवन में दोगली प्रवृत्ति के लोगों को पहचान कर बचना ही श्रेयकर होता है। दोगला मनुष्य कितना भी सोने चांदी का मुलम्मा ओढ़ ले पर उसकी प्रवृत्ति बता देती है कि वह क्या है। इति दोगला शब्दाख्यान।

आकाश में जन्म लेने वाला पक्षी खंजन

खंजन पक्षी को देखते ही अमृतलाल नागर की उपन्यास खंजन नयन याद आती है। जाड़े के दिनों का प्रारंभ होते ही यह पक्षी दिखाई देने लगता है। तुलसी दास जी किष्किंधा कांड में प्रकृति का वर्णन करते हुए इस पक्षी को नहीं भूलते और कहते हैं कि "रस रस सूख सरित सर पानी, ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥ जानि सरद रितु खंजन आए, पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥" 

हमारे पुरखों ने इसे नाम दिया खंजन क्योंकि शरद ॠतु प्रारंभ होते ही यह किसी सुनहली भोर को आकाश से अवतरित हुए होंगे एवं आकाश से अवतरित तब हुए होंगे जब इन्होंने आकाश में जन्म लिया होगा। आकाश में जन्म लेने के कारण इनका नाम धरा गया खंजन। 

खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निजपति कहेउ तिन्हहिं सियँ सयननि।। ग्रामीण स्त्रियाँ उनके साथ के दोनो पुरुषों के विषय में पूछती है तो वे भी खंजन नयन का जिक्र करते हुए बड़ा संकोचकर मृग के नयनों वाली सुंदर सीता कोयल जैसी प्रिय वाणी में कहती हैं - जो सहज स्वभाव के सुंदर और गोरे हें वे मेरे छोटे देवर लक्षमण हैं। 

फिर संकोच के कारण बड़े जतन से अपने मुंह को आंचल से छुपाकर अपने पति की ओर भंवे तिरछी करके इशारा करते हुए खंजन पक्षी की आंखों जैसे सुंदर नेत्रों को तिरछा करके कहा – ‘‘और यह मेरे पति हैं’।’

अरण्यकांड में सीता हरण के पश्चात् राम जब आश्रम लौटकर आते हैं और सीता को वहां नहीं पाते हैं तो सीता के विरह में पागल के समान पेड़-पौधों तक से सीता का पता पूछने लगते हैं और कहते हैं "खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।" 

खंजन पक्षी, शुक कपोत, कमल, आदि सभी सीता के चले जाने से बड़े प्रसन्न हैं क्योंकि सीता उनसे भी अधिक सुंदर हैं और सीता के सामने उनकी सुंदरता तुच्छ है। खंजन पक्षी के नयनों की सुंदरता एवं चंचल चपल होने के कारण इसे साहित्य में स्थान दिया गया है। 

तुलसी दास जी ने रामचरित के माध्यम से इसे अमर कर दिया। हिंदी में इसे धोबन भी कहा जाता है। पंजाब में इसे बालकटारा, बांग्ला में खंजन, आसाम में बालीमाटी और तिपोसी और मलयालम में वेल्ला वलकुलुक्की कहते हैं। 

शकुन अपशकुन विचार शास्त्र में खंजन पक्षी को स्थान दिया गया है, इसे प्रात: सूर्योदय के समय देखना अत्यंत शुभ एवं लाभकारी बताया गया है एवं सूर्यास्त के समय अशुभ। तो देखिए खंजन पक्षी को और जानिए इसके विषय में।

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

लोकपर्व : मालवा निमाड़ का संजा उत्सव

उत्सवों एवं उसकी रचनाधर्मिता से मनुष्य का आदिकाल से नाता रहा है, जिसकी प्राचीनता के प्रमाण हमें शैल चित्रों एवं भित्ति चित्रों के माध्यम से मिलते हैं। हमारे प्रत्येक पर्वों में मांडणे का अत्यंत महत्व है, जिसे हम पर्व की मान्यता के अनुसार मांडते हैं। ऐसा ही एक पर्व मुझे देखने मिला संजा बाई, जिसे मालवा एवं निमाड़ अंचल में कुँवारी बालाओं द्वारा मनाया जाता है।

मान्यता है कि संजाबाई पार्वती जी का ही एक रूप है। जिनकी श्राद्धपक्ष में सोलह दिनों तक पूजा की जाती है। भारत के कई प्रांतों में संजा अलग-अलग रूप में पूजी जाती है। महाराष्ट्र में यही संजा ‘गुलाबाई, फ़ूलाबाई’ बनकर एक माह तक अपने पीहर में रहती है तो वही राजस्थान में ‘संजाया’के रूप में श्राद्ध पक्ष में यह कुँवारी लड़कियों की सखी बन उनके साथ सोलह दिन बिताती है। कुँवारी लड़कियाँ संजाबाई की पूजा अच्छे वर की प्राप्ति के लिए करती है। 

भाद्रपद माह के शुक्ल पूर्णिमा से पितृमोक्ष अमावस्या तक पितृपक्ष में कुंआरी कन्याओं द्वारा मनाया जाने वाला पर्व है। यह पर्व मुख्य रूप से मालवा-निमाड़, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र आदि में मनाया जाता है। संजा पर्व में श्राद्ध के सोलह ही दिनकुंवारी कन्याएँ शाम के समय एक स्थान पर एकत्रित होकर गोबर के मांडने मांडती हैं और संजा के गीत गाती हैं व संजा की आरती कर प्रसाद बांटती हैं। सोलह ही दिन तक कुंवारी कन्याएँ गोबर के अलग-अलग मांडने मांडती है तथा हर दिन का एक अलग गीत भी होता है।

मालवा में ‘संजा’ का क्रम पाँच (पंचमी) से आरंभ होता है। पाँच पाचे या पूनम पाटला से। दूसरे दिन इन्हें मिटाकर बिजौर, तीसरे दिन घेवर, चौथे दिन चौपड़ और पंचमी को ‘पाँच कुँवारे’ बनाए जाते हैं। लोक कहावत के मुताबिक जन्म से छठे दिन विधाता किस्मत का लेखा लिखते हैं, जिसका प्रतीक है छबड़ी।

सातवें दिन सात्या (स्वस्तिक) या आसमान के सितारों में सप्तऋषि, आठवे दिन ‘अठफूल’, नवें दिन ‘वृद्धातिथि’ होने से डोकरा-डोकरी और दसवें दिन वंदनवार बाँधते हैं। ग्यारहवें दिन केले का पेड़ तो बारहवें दिन मोर-मोरनी या जलेबी की जोड़ मँडती है। तेरहवें दिन शुरू होता है किलाकोट, जिसमें 12 दिन बनाई गई आकृतियों के साथ नई आकृतियों का भी समावेश होता है।

इन सोलह दिनों पितृ तर्पण के साथ संजा का उत्सव पितरों की याद की उदासी को उत्सव में बदल देता है। भित्ति पर मांडी गई संजा की पूजा करने के बाद प्रसाद बांटा जाता है। बालिकाएँ इस उत्सव को मनाकर प्रसन्नता प्रकट करती हैं तथा संजा उत्सव के नाम पर आज भी प्राचीन परम्परा को अक्षुण्ण रखना ही बड़ी बात है, वरना लोक परम्पराओं का लोपन गोपन हो जाना कोई बड़ी बात नहीं हैं, इसे जनमानस में जीवित रखना बड़ा काम है। इसके साथ ही गोबर से बनाई जाने वाली भित्ति चित्रकला भी उत्सव के माध्यम से बची हुई है जो पुर्वजों की आदिम कला से हमें जोड़ती है।

रविवार, 10 दिसंबर 2017

मनमोहक पहाड़ी गाँव चौपाल : हिमाचल

जून 2017  में जब हम अपनी बाईक यात्रा में उत्तराखंड एवं हिमाचल की पहाड़ियों में घूम रहे थे तो रात्रि विश्राम नेरवा में किया। सुबह नेरवा से आगे बढे तो सिर्फ़ चढाई ही चढाई थी। लगता था सड़क हमें बादलों के पार पहुंचाने के लिए कमर कसे हुए है। जब टॉप पर पहुंचे तो एक पहाड़ी गाँव चौपाल दिखाई दिया।  

चौपाल, शिमला से कुफ़री ठियोग होते हुए नेरवा से आगे 126 किमी पर हिमाचल प्रदेश का खूबसूरत स्थल है। यहाँ जून माह में जाना हुआ था। चारों तरफ़ हरियाली बिखरी हुई थी एवं ठंड भी थी। यह समुद्र तल से 2550 मीटर (8370 फ़ुट) की ऊंचाई पर है।

गर्मी के दिनों में जब शिमला, मनाली एवं अन्य स्थानों पर पर्यटकों की बाढ आई हुई थी तब यहाँ शांति एवं सुकून का वातावरण था। जून की चमकीली सुबह मनमोहक थी ऐसा लग रहा था कि दो चार दिन डेरा यहीं डाला जाए। पर समयाभाव एवं आगे की यात्रा तिथि निर्धारित होने के कारण संभव नहीं था। 

यहाँ पहुंच कर लगा कि जब अन्य पहाड़ी स्थलों पर जब भीड़ एवं मारामारी हो तो यहाँ तसल्ली से कुछ समय गुजारा जा सकता है। इस समय शिमला में पर्यटकों की भीड़ के कारण पार्किंग भी एक बड़ी समस्या बनी हुई थी। उस समय चौपाल कोलाहल से दूर शांत था। जबकि यह शिमला से 275 मीटर अधिक ऊंचाई पर है। 

यदि हम शिमला के नजदीक स्थित पर्यटन स्थलों जैसे कुफरी, फागू, नालदेहरा, चायल आदि से इस क्षेत्र की तुलना करें तो यहां पर्यटन की उन क्षेत्रों से ज्यादा संभावनाएं हैं। इस क्षेत्र में विद्यमान वन, जल, चोटियां घाटियां, नदी-नाले, झरने, किले, सांस्कृतिक धरोहर, मेले, त्योहार, मंदिर, रीति-रिवाज, पकवान आदि अनुपम हैं। 

बस अब गर्मी के दिनों का इंतजार है, जब चौपाल पहुंचकर कुछ दिन बिताना चाहुंगा और यहाँ कि प्राचीन संस्कृति, कला और धरोहरों से परिचित होना चाहुंगा। अन्य भीड़ भरे पर्यटक स्थलों से यह स्थान मुझे उत्तम लगा। अगर इस स्थान का आनंद लेना है तो कभी शिमला से आगे बढ़िए और प्रकृति की गोद में छिपेे इस अनुपम हीरे से परिचित होइए।

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

नारायणपुर के मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई

सांप और नेवले की कहानी महाभारत से लेकर हितोपदेश तक उपलब्ध होती है। बचपन में सांप एवं नेवले की लड़ाई खूब देखी परन्तु वर्तमान में वन्य प्राणी कानून होने के बाद सांप एवं नेवले की लड़ाई दिखाने वाले दिखाई नहीं देते।

नारायणपुर (कसडोल-छत्तीसगढ़) के मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई का खूबसूरत अंकन किया गया है। नेवला सांप का परम्परागत शत्रु है, कितना भी बड़ा एवं विषैला सर्प हो, अगर नेवला उसके पीछे पड़ गया तो प्राण लिए बिना छोड़ता नहीं है। 
नारायणपुर (कसडोल-छत्तीसगढ़) के मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई
विदेशी वैसे भी भारत को सांपों एवं साधुओं का देश कहते हैं। इनके द्वारा खींचे गए स्नेक चार्मर्स के चित्र बहुधा मिलते हैं। सांपों के प्रति आकर्षण एवं भय दोनो रहता है। विदेशी मंत्र मुग्ध होकर सांपों का खेल देखते हैं।

शिल्पकार ने अपनी छेनी से मंदिर की भित्ति में इसी रोमांच का अंकन किया है। संसार में दिखाई देने वाली छोटे छोटे को दृश्यों का शिल्पांकन कर शिल्पकार ने अपनी विवेकशीलता का परिचय दिया है। हितोपदेश में नेवले की कई कहानियाँ हैं, जिसमें एक कहानी नेवले के स्वामीभक्ति एवं परोपकार की भी है जो इस प्रकार है………

उज्जयिनी नगरी में माधव नामक ब्रा्ह्मण रहता था। उसकी ब्राह्मणी के एक बालक हुआ। वह उस बालक की रक्षा के लिये ब्राह्मण को बैठा कर नहाने के लिये गई। तब ब्राह्मण के लिए राजा का पावन श्राद्ध करने के लिए बुलावा आया। यह सुन कर ब्राह्मण ने जन्म के दरिद्री होने से सोचा कि "जो मैं शीघ्र न गया तो दूसरा कोई सुन कर श्राद्ध का आमंत्रण ग्रहण कर लेगा।

आदानस्त प्रदानस्त कर्तव्यस्य च कर्मणः।
क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम्।।
शीघ्र न किये गये लेन- देन और करने के काम का रस समय पी लेता है।

परंतु बालक का यहाँ रक्षक नहीं है, इसलिये क्या करुँ ? जो भी हो बहुत दिनों से पुत्र से भी अधिक पाले हुए इस नेवले को पुत्र की रक्षा के लिए रख कर जाता हूँ। ब्राह्मण वैसा करके चला गया। वह नेवला बालक के पास आते हुए काले साँप को देखकर, उसे मार कोप से टुकड़े- टुकड़े करके खा गया। वह नेवला ब्राह्मण को आता देख लहु से भरे हुए मुख और पैर किये शीघ्र पास आ कर उसके चरणों पर लोट गया।

फिर उस ब्राह्मण ने उसे वैसा देख कर सोचा कि इसने मेरे बालक को खा लिया है। ऐसा समझ कर नेवले को मार डाला। बाद में ब्राह्मण ने जब बालक के पास आ कर देखा तो बालक आनंद में है और सांप मरा हुआ पड़ा है तो उस उपकारी नेवले को देख कर मन में घबरा कर बड़ा दुखी हुआ।

कामः क्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमर्जिंस्मस्त्यक्ते सुखी नृपः।।

काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार तथा मद इन छः बातों को छोड़ देना चाहिये, और इसके त्याग से ही राजा सुखी होता है।

पूस का महिना और फ़ूस की छानी : अरुणाचल

पूस का महिना प्रारंभ हो चुका। पहाड़ी क्षेत्र की बर्फ़बारी होने लगी और बर्फ़ीली हवाएँ मैदानों की तरफ़ रुख करने लगी हैं। मने की ठंड जोरों पर शुरु हो गई है। गाँव में घर पक्के दिखाई देने लगे हैं, पर सभी नहीं। पक्के घर शीतल हवा को रोकने में सक्षम हैं। द्वार और रोशनदान बंद कर दो तो एक कंबल ठंड रोकने के लिए काफ़ी है। पर फ़ूस के घर में कथरी गोदरी और रजाई की जरुरत पड़ जाती है। 

घर बनाने के लिए जहाँ जो संसाधन उपलबध होता है उससे बना लिया जाता है। कहीं दीवारें मिट्टी की होती हैं और छत फ़ूस की तो कहीं दीवारें बांस की खपच्चियों की होती हैं और छत फ़ूस की। दीवारों के दोनो तरफ़ लिपाई चिकनी मिट्टी से करनी पड़ती है, जिससे कीड़ा कांटा और ठंडी गर्म हवा प्रवेश न करे। छानी के लिए डाला गया फ़ूस तीनों मौसम में साथ निभा देता है, पर दो चार बरस में उसकी देखभाल करनी पड़ती है।

अरुणाचल असम के तराई के इलाकों में बांस बहुत ही अच्छी गुणवत्ता के पाए जाते हैं, जो मोटे होते हैं और गांठे सीधी होती हैं, इनका प्रयोग लकड़ी के स्थान पर धड़ल्ले से होता है। मकान बनाने का तरीका भी सरल ही है। पहले बांस के पायों पर जमीन से चार पांच फ़ुट ऊपर प्लेटफ़ार्म बना लिया जाता है, फ़िर उस पर बांस के खंभे खड़े करके छत बांध ली जाती है। परछी जरा लम्बी होती है तथा छत की अधिक ढलान वर्षा रोकने के बनाई जाती है।

मकान के कई भाग होते हैं, जिनमें जलाऊ लड़की से लेकर मवेशियों के लिए स्थान होता है। परछी के बाद एक लम्बा हॉल और उसके पीछे एक छोटा कमरा एक परिवार के गुजर बसर के लिए मुफ़ीद होता है। मकान के नीचे खाली जगह में जलाऊ लकड़ियाँ और मवेशी स्थान पाते हैं और ऊपर मनुष्य रहते हैं। 

कपड़े रखने के लिए बांस की अरगनी होती हैं। जिसमें कपड़े टाँग दिए जाते हैं। हॉल में ही एक स्थान पर चूल्हे बना होता है जिस पर भोजन बनाकर सभी एक स्थान पर ही बैठकर भोजन करते हैं और चूल्हे के ऊपर धुंआ देकर संरक्षित करने के लिए मांस लटका दिया जाता है। चूल्हा मध्य में बना होने के कारण घर में ताप बना रहता है जिसे रोकने का काम फ़ूस की छत करती है। बांस का उपयोग अधिक होने के कारण कम खर्च में घर बनकर तैयार हो जाता है एवं बांस का भी उपयोग हो जाता है। 

हरियाली के बीच ये घर बहुत सुंदर दिखाई देते हैं। जंगली केले के गाछ हर जगह दिखाई देते हैं। हमने देखा कि इस समय केले में फ़ूल फ़ूट रहे थे जो केले फ़रने की प्रारंभिक अवस्था है। पथिक को अगर परदेश में ऐसी शरण स्थली मिल जाए तो किसी स्वर्ग से कम नहीं है। पूस के महीने में ठंड में सिर छिपाने के लिए फ़ूस की छत, खाने के लिए भात और तेंगामाछ, पीने के लिए ओपोंग और सुतने के लिए कोदो पैरा का गद्दा, ओढने के लिए कथरी तो सारे जहान की दौलत वारी जा सकती है। पर अरुणाचली #दाव से बचके। 😃

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

समुद्र जैसा तालाब : बालसमुंद पलारी

तालाबों की कथा किसी तिलस्म से कम नहीं है, इनकी प्राचीनता के साथ कथा कहानियाँ भी जुड़ जाती हैं और पीढी दर पीढी अग्रेषित होती रहती हैं। ऐसा ही एक तालाब है जिसे बालसमुंद कहते हैं। यह रायपुर से बलौदाबाजार रोड़ पर 70 किमी की दूरी पर पलारी ग्राम की पहचान बना हुआ है। इस तालाब का विस्तार लगभग 120 एकड़ में बताया जाता है।  
बालसमुंद पलारी 
मानव निर्मित यह तालाब अपनी विशालता के कारण जलाशय कहलाता है। इसके बीच में एक टापू बना हुआ है, कहते हैं कि तालाब खोदने वाले संझाकाल में घर जाने वक्त अपनी मिट्टी फ़ेंकने की टोकरियाँ (बांस का झौंआ) झाड़ते थे। जिसके कारण इस टापू का निर्माण हो गया। इससे तालाब निर्माण के दौरान नियोजित श्रमिकों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

दक्षिण कोसल में ईंटों से मंदिर निर्माण की परम्परा रही है। इस तालाब के किनारे भी ईंटो बना हुआ सिद्धेश्वर नामक शिवालय है। पुराविद इसका निर्माण काल 7 वीं 8 शताब्दी निर्धारित करते हैं, इस पश्चिमाभिमुख मंदिर में द्वार शाखा पर नदी देवी गंगा एवं यमुना अपने परिचारको के साथ त्रिभंग मुद्रा में प्रदर्शित की गई है।
शिवालय बालसमुंद पलारी 
 सिरदल पर त्रिदेवों का अंकन है। द्वारशाखाओं पर अष्ट दिक्पालों के अंकन के साथ प्रवेश द्वार के सिरदल पर शिव विवाह का सुंदर अंकन किया गया है। इस मंदिर का शिखर भाग कीर्तिमुख, गजमुख एवं व्याल की आकृतियों से अलंकृत है जो चैत्य गवाक्ष के भीतर निर्मित हैं। विद्यमान छत्तीसगढ़ के ईंट निर्मित मंदिरों का यह उत्तम नमूना है। 

कहते हैं कि इस तालाब का निर्माण घुमंतू नायक जाति के राजा ने छैमासी रात में करवाया था। घुमंतू नायक एक बार अपने लाव लश्कर के साथ इस स्थान पर डेरा लगाए। उस समय यह जंगल था और निस्तारी के लिए पानी उपलब्ध नहीं था। तब नायक राजा ने यहाँ तालाब बनवाने का निर्णय लिया। उसने 120 एकड़ में इस तालाब का निर्माण कराया, परन्तु तालाब में पानी नहीं भरा, वह सूखा का सूखा रहा। 
 नदी देवी शिवालय बालसमुंद पलारी 
तब सयानों के कहने पर नायक राजा ने अपने नवजात शिशु को परात में रख कर तालाब में छोड़ दिया। इस टोटके के बाद रात में तालाब भर गया और बालक भी परात सहित ऊपर आ गया। तब से इस तालाब का नाम बालसमुंद हो गया। इस तालाब में बारहों महीना पानी रहता है तथा यहाँ का जल नीला एवं निर्मल है। तालाब के किनारे खड़े होने पर जल का विस्तार देखकर समुद्र के किनारे खड़े होने का भान होता है। इसकी विशालता अपना नाम सार्थक करती है।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

प्रतिमा शिल्प में बुद्ध की विभिन्न मुद्राएं

भारतीय शिल्पकला में हिन्दू एवं बौद्ध प्रतिमाओं में प्रमुखता से आसन एवं हस्त मुद्राएं अंकित की जाती है। हमें प्राचीन स्थलों पर आसनस्थ बुद्ध विभिन्न मुद्राओं में दिखाई देते हैं। जिनमें प्रमुख अभय मुद्रा, ध्यान मुद्रा, धर्म चक्र मुद्रा, एवं भूमि स्पर्श मुद्रा है। इसके साथ ही बज्र मुद्रा, वितर्क मुद्रा,ज्ञान मुद्रा, करण मुद्रा तथा बुद्ध के महानिर्वाण को भी शिल्प में स्थान दिया गया है। कुछ बुद्ध प्रतिमाएं विभिन्न मुद्राओं में देखिए। 
भूमि स्पर्श मुद्रा बुद्ध, राजिम छत्तीसगढ़
भूमि स्पर्श मुद्रा थिम्पू भूटान
अभय मुद्रा, धौली भुवनेश्वर उड़ीसा
धम्म चक्र परवर्तन मुद्रा- धौली भुवनेश्वर उड़ीसा
पद्मासन ध्यान  मुद्रा- सिरपुर छत्तीसगढ़ 
वज्र मुद्रा- कान्धार शैली

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ का गढ़ मोंहदीगढ़

ई विद्वानों का मत है कि मध्यकाल में कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ों को लेकर छत्तीसगढ़ का निर्माण हुआ। ये गढ़ कलचुरी शासन काल में प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाई थे। कालांतर में कलचुरी दो शाखाओं में विभक्त हुए, शिवनाथ नदी के उत्तर में रतनपुर शाखा एवं दक्षिण में रायपुर शाखा का निर्माण हुआ। 
मोंहदीगढ़ के पठार की ओर ले जाती पैड़ियाँ
ये गढ़ इस प्रकार हैं - रतनपुर के १८ गढ़ : रतनपुर, उपरोड़ा, मारो, विजयपुर, खरौद, कोटगढ़, नवागढ़, सोढ़ी, ओखर, पडरभट्ठा, सेमरिया, मदनपुर, कोसगई, करकट्टी, लाफा, केंदा, मातीन, पेण्ड्रा एवं रायपुर के १८ गढ़ : रायपुर, पाटन, सिमगा, सिंगारपुर, लवन, अमेरा, दुर्ग, सारधा, सिरसा, मोहदी, खल्लारी, सिरपुर, फिंगेश्वर, सुवरमाल, राजिम, सिंगारगढ़, टेंगनागढ़, अकलवाड़ा।
मोंहदीगढ़ का पठार
समय ने करवट ली और कलचुरी राज का पतन हो गया। मराठों ने रायपुर शाखा के अंतिम शासक अमरसिंह की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र शिवराज सिंह को पांच गाँव (बड़गांव, मुढेना, भलेसर, गोईंदा, नांदगाँव) माफ़ी के देकर एवं पुर्वजों के प्रत्येक गांव से एक रुपया खर्च देकर इनका अधिकार समाप्त कर दिया।
ऊपर चढे चलो भाई
वर्तमान में इन कलचुरियों के वंशज महासमुंद जिले के इन पांच गांवों में निवास करते हैं। इनके विषय में वैसे तो मुझे पूर्व में भी जानकारी थी। परन्तु कलचुरी वंशजों से मिलना कल हुआ। लाल विजय सिंहदेव एक अरसे से मेरे फ़ेसबुक मित्र थे, परन्तु इनसे कभी मिलना, भेंटना नहीं हुआ था। कल महासमुंद से इनसे मुलाकात हुई। सरल स्वभाव के उर्जावान युवक हैं और अपने इतिहास एवं धरोहरों के प्रति भी जागरुक दिखाई दिए।
रायपुर कलचुरी वंशज लाल विजय सिंह देव
सुबह इनके साथ रायपुर शाखा के अठारह गढ़ों में से एक मोंहदीगढ़ जाना हुआ। यह महासमुंद से खल्लारी मार्ग पर 12 किमी की दूरी पर मोंहदी नामक ग्राम की डुंगरी पर है। यहाँ गढीन माई (चम्पई माता) का स्थान है। जिन्हें आस पास के ग्रामीण अपनी आराध्या मानते हैं और पूजन करते हैं। मोंहदी ग्राम के सरपंच खेमराज दीवान हैं, जो गौंटिया परिवार से ही हैं। इनके साथ हमने गढीन दाई के दर्शन एवं गढ के अवशेषों की खोज में डुंगरी पर चढाई की। 
मोंहदी सरपंच खेमराज दीवान
डुंगरी के शीर्ष पर पढार है, इससे जुड़ा हुआ अमली पठार भी है और उपर से बेलर गांव की तरफ़ जाने का रास्ता भी है। वर्तमान में हुए निर्माणों के अलावा अन्य प्राचीन निर्माण के अवशेष यहाँ दिखाई नहीं देते। परन्तु डुंगरी में सुरंग एवं गुफ़ाएं होने की कथा सुनाई देती है। ऐसी एक सुरंग नुमा खोह में चम्पई माता विराजित हैं। अनगढ़ पाषाण की यहाँ दो प्रतिमाएँ हैं, जिनमें आँखे जड़ी हुई हैं। नवरात्रि के अवसर पर यहाँ ज्योति जलाई जाती है और मेला भी भरता है।
मोंहदीगढ़ की कंदराएँ
यहाँ से पठार पर चलकर बेलर गांव के रास्ते में एक मानव निर्मित प्रस्तर भित्ति जैसी संरचना दिखाई देती है। जहाँ स्थानीय देवता विराजमान हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ दिखाई नहीं देता। अधिक जानकारी एवं शोध के लिए डुंगरी का चप्पा चप्पा छानना होगा। हो सकता है कि प्राचीन मानव बसाहट के चिन्ह मिल जाएं। 
झुरमुटों के बीच से रास्ता
समय कम होने के कारण मैं यह कार्य नहीं कर सका। डुंगरी से नीचे उतरने पर एक फ़र्लांग की दूरी पर दस पन्द्रह घरों की प्रस्तर नींव दिखाई देती है, जिससे लगता है कि कभी यहाँ मानव की बसाहट रही होगी। सरपंच खेमराज ने बताया कि यहाँ पर एक प्राचीन कुंआ भी है। 
चम्पई माता मोंहदीगढ़
वैसे छत्तीसगढ़ में मोंहदी नामक कई गांव मिलते हैं, परन्तु भौगौलिक परिस्थितियों को देखने पर प्रतीत होता है कि यही स्थान मोंहदीगढ़ रहा होगा। क्योंकि खल्लारी, सुअरमाल, फ़िंगेश्वर, सिरपुर आदि गढ़ इसके आस पास ही हैं। इस यात्रा के लिए लाल विजय सिंहदेव का आभार। फ़िर कभी समय एवं अवसर मिला तो इस क्षेत्र की तपास की जाएगी

रविवार, 3 दिसंबर 2017

कलजुग केवल नाम आधारा, टमर टमर नर उतरहिं पारा।

हजार बार टटोलता हूँ घर से निकलने पहले आधारकार्ड को, भूल तो नहीं गया। अगर किसी ने आधार पूछ लिया और न मिला तो कहीं परग्रही करार न दे दिया जाऊं, अच्छा भला आदमी पी के हो जाएगा। भले ही और भी कुछ जरुरी सामान छूट जाए, पर आधार नहीं छूटना चाहिए वरना निराधार चपेट में आने का खतरा बना रहता है। 
सफ़र के दौरान हवाई अड्डे के प्रवेश द्वार पर ही टिकिट के साथ पहचान पत्र दिखाना पड़ता है, अब आदमी कितने पहचान पत्र रखे, आधार दिखाने से काम चल जाता है, भले ही फ़ोटो किसी और की सी लगे, पर सुरक्षा अधिकारी आधार देखते ही भीतर जाने दे देता है, समझता है कि देश का जिम्मेदार एवं ईमानदार नागरिक है, जो निराधार नहीं है। 
पूरे सफ़र में घर लौटते तक दिमाग पर आधार ही छाया रहता है, बैठे-बैठे चौंक कर अनायास ही आधारकार्ड पर हाथ चला जाता है, जरा टटोल लूँ कहीं भूल तो नहीं आया। बैग में भी कई जेबें होती है, इधर वाली में रखकर उधर वाली में टटोलने पर अगर आधारकार्ड नहीं मिलता तो माथे से पसीने की बूंदे चूह जाती हैं। फ़िर सारा सामान उलटकर आधार मिलने पर जो संतुष्टि होती है, उसका बयान नहीं कर सकता।
एक बरस पहले ही बैंक मैनेजर ने आधारकार्ड मांग लिया था, कहा कि खाते से आधारकार्ड लिंक करना पड़ेगा, उसके बाद रसोई गैस भी आधारकार्ड से लिंक हो गई, अब तो हालात ये हो गए हैं कि सांसे भी आधारकार्ड से स्वत: लिंक हो गई हैं। चौबीस घंटे में जितनी सांसे लेता हूँ पूरी गिनती आधारकार्ड बता देता है। राशन से लेकर प्राशन तक सब आधार हो गया है। 
कुछ दिन पहले नगर पंचायत से कूड़े के दो डिब्बे (नीले-हरे) वितरण करने के लिए कर्मचारी आए। डिब्बे रखने के बाद उन्होंने पहले आधारकार्ड मांगा। पंजी में आधारकार्ड नम्बर दर्ज करने के बाद उन्होंने दोनो डिब्बे मेरे सुपूर्द किए और कहा कि आजकल तो हर चीज में आधारकार्ड अनिवार्य हो गया है। बिना आधार कोई भी शासकीय सुविधा नहीं मिल सकती। शासकीय अस्पताल में आधारकार्ड अनिवार्य हो गया है, जिसके पास आधारकार्ड नहीं, उसको ईलाज कराने की पात्रता नहीं।
कुछ दिनों पहले एक समाचार सोशल मीडिया में वायरल हो रहा था कि फ़रीदाबाद के श्मशान से। जहाँ बड़ा सारा सूचना पट लगा है, जिसमें लिखा है कि मृतक का आधार कार्ड लाना जरुरी है, नहीं तो संस्कार नहीं होगा। लो जी! आधार ने अब तक तो जीना मुहाल कर रखा था अब मरना भी दुष्कर हो गया। 
लगता है कि अगर बिना आधार कार्ड मर गए और जबरिया अंतिम संस्कार कर भी दिया तो ऊपर बिना आधार कार्ड के यमराज जी स्वीकार नहीं करेंगे। दुआरे से लात मार दिए जाओगे, न नीचे के रहोगे न ऊपर के। मैं तो यह सोचकर हलकान हूँ कि अब न जाने कितने त्रिशंकू ब्रह्माण्ड में चक्कर लगाएंगे निराधार होकर। राम जाने कितनी कर्मनाशाएँ धराएँ पर अवतरित होंगी।
इन सब हालात को देखकर भगवान से एक ही विनती है कि अब किसी को धरती पर भेजे तो बिना आधारकार्ड के न भेजे। ऊपर से सीधे आधार नम्बर प्रिंटेट बॉडी भेजे। माथे पर लिखा हुआ आधार नम्बर दूर से ही दिख जाए। न खो ने झंझट, न ढूंढने का लफ़ड़ा। न दिल दिमाग आधार के पीछे लगा रहे। यहाँ तो जिन्दगी आधारकार्ड संभालने और नम्बर दर्ज कराने में बीत रही है। भाई इतना तो रहम करो, आधार के बिना जीने नहीं दे रहे, कम से कम मरने तो दो। कलजुग केवल नाम आधारा, टमर टमर नर उतरहिं पारा।

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

जानिए क्यों मनाई जाती है छोटी दीवाली

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहा जाता है। नरक चतुर्दशी को 'छोटी दीपावली' भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त इस चतुर्दशी को 'नरक चौदस', 'रूप चौदस', 'रूप चतुर्दशी', 'नर्क चतुर्दशी' या 'नरका पूजा' के नाम से भी जाना जाता है। 

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी के दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है। दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के दिन संध्या के पश्चात दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं। 

इस चतुर्दशी का पूजन कर अकाल मृत्यु से मुक्ति तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यमराज जी की पूजा व उपासना की जाती है।

शास्त्रों के अनुसार दस दिशाएं मानी गई है, जिसमें सभी दिशाओं के रक्षक दिग्पाल कह्रे जाते हैं। ऊर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारूत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत के रक्षक होते हैं। 

प्राचीन काल में इन दिग्पालों की स्थापना मंदिरों की भित्तियों में इनकी दिशाओं के अनुसार की जाती है। चित्र में भुवनेश्वर के राजा रानी मंदिर में स्थापित यम दिखाई दे रहे हैं।

एक कथा के अनुसार रन्तिदेव नामक एक राजा हुए थे। वह बहुत ही पुण्यात्मा और धर्मात्मा पुरूष थे। सदैव धर्म, कर्म के कार्यों में लगे रहते थे। जब उनका अंतिम समय आया तो यमराज के दूत उन्हें लेने के लिए आये। 
वे दूत राजा को नरक में ले जाने के लिए आगे बढ़े। यमदूतों को देख कर राजा आश्चर्य चकित हो गये और उन्होंने पूछा- "मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया है तो फिर आप लोग मुझे नर्क में क्यों भेज रहे हैं। कृपा कर मुझे मेरा अपराध बताइये, कि किस कारण मुझे नरक का भागी होना पड़ रहा ह।". राजा की करूणा भरी वाणी सुनकर यमदूतों ने कहा- "हे राजन एक बार तुम्हारे द्वार से एक ब्राह्मण भूखा ही लौट गया था, जिस कारण तुम्हें नरक जाना पड़ रहा है।

राजा ने यमदूतों से विनती करते हुए कहा कि वह उसे एक वर्ष का और समय देने की कृपा करें। राजा का कथन सुनकर यमदूत विचार करने लगे और राजा को एक वर्ष की आयु प्रदान कर वे चले गये। यमदूतों के जाने के बाद राजा इस समस्या के निदान के लिए ऋषियों के पास गया और उन्हें समस्त वृत्तांत बताया। 

ऋषि राजा से कहते हैं कि यदि राजन कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करे और ब्राह्मणों को भोजन कराये और उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करे तो वह पाप से मुक्त हो सकता है। ऋषियों के कथन के अनुसार राजा कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करता है। इस प्रकार वह पाप से मुक्त होकर भगवान विष्णु के वैकुण्ठ धाम को पाता है। 

एक अन्य प्रसंगानुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक माह में कृष्ण चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध करके देवताओं व ऋषियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलवाई थी। इसके साथ ही कृष्ण भगवान ने सोलह हज़ार कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त करवाया। इसी उपलक्ष्य में नगरवासियों ने नगर को दीपों से प्रकाशित किया और उत्सव मनाया। तभी से नरक चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाने लगा।

एक अन्य कथानुसार भगवान राम के भक्त महावीर हनुमान जी का जन्म आज के ही दिन हुआ था। हनुमान जी को रूद्र के अवतारों में से एक माना जाता है। 

भगवान राम त्रेतायुग में धर्म की स्थापना करके पृथ्वी से अपने लोक बैकुण्ठ चले गये। लेकिन भगवान राम ने धर्म की रक्षा के लिए प्रलय काल तक हनुमान को पृथ्वी पर रहने का आग्रह किया। इसके लिए राम ने हनुमान ही को अमरता का वरदान दिया। 

बुधवार, 5 जुलाई 2017

प्राचीन काल के प्रतिमा शिल्प में आभूषण अलंकरण

स्त्री एवं पुरुष दोनों प्राचीन काल से ही सौंदर्य के प्रति सजग रहे हैं। स्त्री सौंदर्य अभिवृद्धि के लिए सोलह शृंगार की मान्यता संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक चली आ रही है। कवियों ने अपनी कविताओं में नायिका के सोलह शृंगार का प्रमुखता से वर्णन किया है तो शिल्पकार भी क्यों पीछे रहते, उन्होंने भी प्रतिमा शिल्प में सौंदर्य वृद्धि की सभी युक्तियों को कुशलता के साथ उकेरा है। मंदिरों की भित्तियों में स्थापित जब हम प्रतिमा शिल्प को देखते हैं तो नख-शिख अलकंरण दिखाई देता है, जिसमें वस्त्राभूषण अलंकरण प्रमुखता से उकेरे गए हैं।
पायल धारिणी (राजा रानी मंदिर भुवनेश्वर उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
गुप्तकाल से मंदिर शिल्प योजना में भित्तियों में प्रतिमा शिल्प का प्रयोग दिखाई देता है। इसके पश्चात के काल में प्रतिमा शिल्प के अलंकरण में भिन्नता स्पष्ट दिखाई देती है। वस्त्रों के छापे, पहने का ढंग एवं आभूषणों की बनावट भी पृथक दिखाई देती है। इन प्रतिमाओं में हम देखते हैं कि पुरुष सौंदर्य की वृद्धि के लिए केश विन्यास, वस्त्र, माला, बाजूबंद पहने दिखाई देते हैं। जबकि स्त्रियों के आभूषण अलग दिखाई देते हैं। जिस तरह वर्तमान काल में वस्त्रों एवं आभूषणों में बदलाव फ़ैशन के आधार पर होता है उसी तरह प्राचीन काल में बदलाव दिखाई देता है। 
संध्या काल ( सूर्य मंदिर कोणार्क उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
लगभग तीस वर्षों के भ्रमण काल में मैने विभिन्न कालों में निर्मित मंदिरों के स्थापत्य एवं प्रतिमा शिल्प को देखा है। आप प्रतिमा अलंकरण को देखकर उसके निर्माण काल का अंदाजा लगा सकते हैं। आभूषण (आभरण) प्राचीन काल से ही अलंकरण का साधन रहे हैं। भारत के निवासी प्राचीन काल से आभूषन प्रिय रहे हैं जो आभूषण केश से लेकर पैरों तक धारण करते थे। केशों में चिमटी, माथे पर बेन्दा, कानों में कुंडल, गले में हार, बाजू पर बाजूबंद, कलाई में चूड़ी, कमर में कमरधनी, उंगली में अंगूठी एवं पैरों में पायल का अलंकरण होता था। वर्तमान में इन आभूषणों का प्रयोग उसी रुप में विद्यमान है।
संध्या काल ( शिवालय देवर बीजा, जिला बेमेतरा छत्तीसगढ़) फ़ोटो ललित शर्मा
प्रतिमाओं के शीर्ष पर कीरीट मुकुट दिखाई देता है। स्त्री एवं पुरुष कानों को समान रुप से विभूषित करते थे। तत्कालीन साहित्य में कुंडल एवं कर्णिका का वर्णन होता है। विविध धातुओं से निर्मित रत्नकर्णिका, दारुकर्णिका, त्रपुकर्णिका कहलाती थी। इसके अतिरिक्त आमुक्तिका आभूषण का उल्लेख मिलता है। इसमें कुंडल, आधुनिक झुमके, कर्णिका, बाली एवं आमुक्तिका को टॉप्स माना जा सकता है। घोंघे की खोल जैसे टॉप्स वर्तमान में भी दिखाई देते हैं।
नर्तकी (गणेश मंदिर हम्पी कर्नाटक) फ़ोटो ललित शर्मा
समकालीन साहित्य में कंठ में पहने जाने वाले विभिन्न प्रकार के हारों का उल्लेख है।  जिसमें सुवर्ण सूत्र, कंठ सूत्र, अर्ध हार, हार के साथ मुक्ता हारों में नील मुक्ताहार, लोहित मुक्ताहार एवं श्वेत मुक्ताहार तथा विभिन्न धातुओं से निर्मित रत्नहार, रुचक हार, हिरण्यहार, सुवर्णहार, दंतहार, काषार्पण हार चन्द्रहार प्रमुख हैं, इसके परवर्ती राजपूत काल में नौलखा हार की खूब धूम रही। कंठ आभूषणों में वनमाला का उल्लेख भी आवश्यक है। अधिकतर विष्णु की मूर्ति में वनमाला का अंकन मिलता है। बाजू में धारण करने वाले आभूषण वलय, केयूर एवं अंगद नाम से जाने गए। वलय हाथीदांत से युक्त होता था, केयूर स्वर्ण से बनता था तथा अंगद स्वर्ण एवं रजत के तारों से बनाया जाता था। 
कलश धारिणी देवी (जराय का मठ बरुआ सागर उत्तर प्रदेश) फ़ोटो ललित शर्मा
चूड़ियों को कटक वलय यादि कहा जाता था, इन्हें विभिन्न धातुओं से एवं आकारों में बनाया जाता था। अंगुली में पहने के लिए अंगुलिमुद्रा एवं मुद्रिका या अंगुलीयक होती थी। कई प्रतिमाओं में तो कई अंगुलियों में अंगूठी धारण किए हुए दिखाया गया है। इसके साथ ही मेखला कमर का आभूषण था इसे स्त्रियाँ धारण करती थी, यह रत्न एवं ताम्रयुक्त होती थी। इसे करधनी, किंकणी, कटक, सुवर्णसूत्र, रशना, कांची मेखला आदि कहा जाता है। घुंघरुयुक्त बजने वाली करधनी को कांचीगुण कहा गया है। पैरों में पैजनी, पायल इत्यादि धारण की जाती थी, यह लघुघंटिकायुक्त रजत एवं कांसे से निर्मित की जाती थी। 
नदी देवी गंगा ( देऊर मंदिर मल्हार जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़) फ़ोटो ललित शर्मा
प्रतिमा शिल्प में अप्सराओं, नायिकाओं एवं देवियों को भिन्न भिन्न तरह के आभूषणों से अलंकृत किया जाता था तथा उनके अनुचरों, परिचारको एवं परिचारिकाओं के शरीर पर आभूषण कम दिखाई देते हैं। उस काल में भी बड़े लोग स्वर्ण, रजत एवं बहुमुल्य रत्न जड़ित आभूषणों का प्रयोग करते थे। जिनके पास (दास दासियाँ) अधिक धन नहीं होता था वे रजत, कांसे एवं तांबे के आभूषण धारण करते थे। वर्तमान में यही परिपाटी दिखाई देती है। आभूषण हमेशा उच्चकुल एवं धनवानों के ही होते हैं।
शाल भंजिका ( मुक्तेशर मंदिर समूह भुवनेश्वर उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
आभूषणों का महत्व सौंदर्य वृद्धि के साथ धार्मिक भी है, जिस प्रकार विवाहित स्त्रियां बेन्दा (टीका) धारण करती हैं, कुछ स्थानों पर मंगलसूत्र विवाहित एवं सौभाग्य का सूचक माना गया है। इसी तरह पुरुष भी ताबीज इत्यादि धारण करते थे। उत्खनन के दौराण अर्ध मूल्यवान रत्न अधिक प्राप्त होते हैं, जिनका आभूषणों में प्रयोग किया जाता था। स्वर्ण एवं रजत के आभूषणों में पत्थर भी जड़े जाते थे, जिन्हें रत्न कहा जाता है। गोमेद, जम्बुमणि, स्फ़टिक, सेलखड़ी, हाथी दांत, शीशा आदि जड़े जाते थे। इसके अतिरिक्त मिट्टी के मनके भी धारण किए जाते थे। 
चंवर धारिणी ( विट्ठल मंदिर हम्पी कर्नाटक) फ़ोटो ललित शर्मा
उपरोक्त आलेख के लिए मैने भारत के चारों ओर के विभिन्न मंदिरों की भित्तियों में जड़ित प्रतिमाओं के चित्रों को जुटाया है। इनमे एक चीज समान है, वह है कि किसी भी प्रतिमा की नाक में छिद्र नहीं है अर्थात प्राचीन काल में नाक में नथ, कील, लौंगादि आभूषण धारण नहीं किए जाते थे। कुछ विद्वानों का मत है कि कुषाण काल तक की प्रतिमाओं में नाक का आभूषण प्राप्त नहीं होता। मेरे द्वारा खींचे गए चित्रों में आठवीं शताब्दी से लेकर चौदहवी एवं पन्द्रहवी शताब्दी तक की प्रतिमाएँ जुटाई गई है। जिसमें किसी ने भी नाक का आभूषण नहीं पहना है।
क्षीर सागर में शेष शैया पर भगवान विष्णु एवं देवी लक्ष्मी (लक्ष्मीनारायण मंदिर ओरछा) फ़ोटो ललित शर्मा
अब प्रश्न यह उठता है कि महिलाओं द्वारा नाक में आभूषण कब से पहने जाने लगा। इसका जवाब भी मंदिरों से प्राप्त होता है। जब मैं ओरछा भ्रमण कर रहा था तब लक्ष्मीनारायण मंदिर की भित्तियों पर अठारवीं शताब्दी की भित्ति चित्रकारी दिखाई थी। इस चित्रकारी में रामायण के प्रसंगों से लेकर अंग्रेजों के साथ युद्ध तक को प्रदर्शित किया गया है। इन भित्ति चित्रों में कृष्ण राधा के उपवन विहार का प्रसंग भी दिखाई देता है, इस चित्र में सभी महिलाओं ने नाक में नथ पहन रखी है। शेष शैया पर विश्राम करते विष्णु के चित्र में भी लक्ष्मी की नाक में नथ पहनाई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि नाक में आभूषण पहनने की परम्परा मुगल काल में प्रारंभ हुई और अद्यतन जारी है।    

शनिवार, 1 जुलाई 2017

मानव का पक्षी प्रेम एवं शुक सारिका प्रसंग


क्षियों से मनुष्य का जन्म जन्मानंतर का लगाव रहा है। पक्षियों का सानिध्य मनुष्य को मन की शांति प्रदान करता है तो बहुत कुछ सीखने को उद्यत करता है। कुछ पक्षी तो ऐसे हैं जो मनुष्य से उसकी बोली में बात करते हैं और इन्होंने सामान्य नागरिक के गृह से लेकर राजा महाराजाओं के महलों के अंत:पुर एवं ॠषियों की कुटियों में भी स्थान पाया है। शुक एवं काग ऐसे पक्षी हैं, जो ॠषियों के सानिध्य में ज्ञानार्जन कर शुकदेव एवं कागभुसुण्डि के नाम से लोक में प्रतिष्ठित हुए। शुक के सम्बंध में एक धारणा यह भी है कि वह बहुत बुद्धिमान होता है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार शुक ने शिवजी का समस्त ज्ञान श्रवण द्वारा आत्मसात कर लिया था। वही अध्यात्म-पारंगत शुकदेव रूप में अवतरित हुआ।  इतिहास आलेख  शुक सारिका 
शुक सारिका खजुराहो 
विरहणी के एकांत के संगी के रुप में तोता-मैना लोक प्रसिद्ध हैं। अंत:पुर की विरह व्याकुल रमणी के द्वारा इन पक्षियों के संवाद से संस्कृत साहित्य भरा पड़ा है। तोता-मैना का लोक प्रसिद्ध कहानी एवं संवाद एक समय में यह युवा एवं युवती के मुंह से सुना जा सकता था। शुक-सारिका को लेकर बहुत ही कथाएं प्रचलित हैं, इन्हीं का लोक कथाओं में रूपान्तर ‘किस्सा तोता-मैना’ के नाम से हुआ जिसके विविध संस्करण बाजार में उपलब्ध हैं। ये दोनो पक्षी मनुष्य की बोली में बोलने की क्षमता के कारण प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान तक मनुष्य के साथी बने हुए हैं।

ऐसे में ये पक्षी शिल्पकार की दृष्टि से कैसे ओझल हो सकते थे। तोता-मैना को शिल्पकारों में अपने शिल्प में शुकसारिका के रुप में स्थान दिया। प्राचीन मंदिर स्थापत्य में शुकसारिका का शिल्पांकन प्रमुखता से दिखाई देता है। शिल्पकारों ने शुकसारिका को अपने शिल्प का विषय बनाया, जिससे युगों युगों तक पक्षी एवं मनुष्य के सानिध्य, प्रेम एवं सहवास को आने वाली पीढियाँ जान सकें। मुझे भारत में आठवीं नवमी शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी तक के स्थापत्य में शुक सारिका का शिल्पांकन दिखाई देता है। ऐसे में शुक सारिका के शिल्पांकन से खजुराहो के मंदिर कैसे अछूते रह सकते हैं। जहाँ कामसूत्र का शिल्पांकन हो वहाँ शुक सारिका का शिल्पांकन अवश्य मिलता है क्योंकि कामसूत्र में शुक सारिकाओं के साथ आलाप करने कराना की क्रिया को चौसठ कलाओं में गिना गया है।
लोक में तोता ही एक ऐसा पक्षी एवं जीव है जो मनुष्य की वाणी का अनुकरण कर सकता है। इसे बोलना सिखाना पड़ता है या यह किसी भी बोलते हुए मनुष्य का अनुकरण कर रटता है, परन्तु मैना स्वत: बोलती है। बस्तर की पहाड़ी मैना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी आवाज में बात करके अचंभित कर दिया था। शुक सारिका लोक प्रसिद्ध हैं, शुक ख्याति तो ऐसी है कि इसे पालने वाले सबसे पहले राम राम, सीता राम बोलना सिखाना है। किसी के घर के शुक की वाणी सुनकर उस परिवार के आचार विहार का आंकलन किया जा सकता है कि परिवार कितना सुसंस्कृत एवं सभ्य है। 
मुक्तेश्वर मंदिर समूह भुबनेश्वर की शुक सारिका 
साहित्य में शुक ने प्रमुख स्थान पाया है, इसकी उपस्थित संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक प्राप्त होती है। जायसी के ‘पद्मावत’ में तोते को गुरु और मार्गदर्शक का पद प्राप्त है। ‘हीरामन’ नाम से वह रत्नसेन और पद्मावती को परामर्श भी देता है और उनके मिलन में सहायक भी होता है। रचना के अन्त में उसके बारे में स्पष्ट लिखा है—सूआ सोई जे पंथ दिखावा। बिनु गुरु जगत को निर्गण पावा।
मुंशी प्रेमचंद की कहानी आत्माराम में वेदीग्राम का सुनार महादेव तोते के साथ अपने एकाकीपन को बांट लेता है। तो प्राचीनकाल के अंत:पुर की रमणियाँ भी शुक के साथ संवाद कर अपने एकाकीपन को दूर करती थी। छत्तीसगढ़ के लोकगीतों में सुआ प्रमुख स्थान रखता है। यहाँ यह विरहणी का संवदिया बनता है और सुआ गीत एवं सुआ नृत्य के रुप में लोक में स्थापित एवं प्रतिष्ठित हो जाता है। 
तोते की चोंच (शुक चंचू) जैसी किंचित टेढ़ी नासिका सौंदर्य का प्रतीक बनती है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की शुकनासिका और बिम्ब अधरों का बहुत ही आकर्षक चित्र खींचा है। एक तोते को उर्मिला के नाक के मोती पर होंठों की कान्ति पडऩे के कारण अनार के दाने की भ्रान्ति हुई। फिर नाक को देखकर सोचता है यह दूसरा तोता कहां से आ गयाकवियों ने तोते का अनेक रूपों में चित्रण किया है। बड़े शौक से पाला हुआ तोता भी कभी उपेक्षा का शिकार हो जाता है और काले कौवों को सम्मान मिलता है। बिहारी ने अन्योक्ति के रूप में इसका चित्रण किया है।
मरत प्यास पिंजरा पर्यो सुआ समै के फेर।
आदर दै दै बोलियत वाईसु बलि के बेर॥
शुक-सारिका तो अनादिकाल से ही घरों एवं आश्रमों की शोभा बढ़ाते रहे हैं। जगज्जनी जानकी की विदा के समय उनके द्वारा पाले हुए ये पक्षी इतने दुःखी हुए कि इन्होंने परिजनों को भी अधीर कर दिया—
सुक सारिका जानकी ज्याये। कनक पिंजरन्ह राखि पढ़ाये॥
व्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुवि धीरजु परिहरह न केही॥
शुक सारिकाएँ राज महलों या किसी विलासी नागरिक के बहिर्द्वार तक ही नहीं मिलती थी इनकी उपस्थिति तपोवन में ॠषि निवासों में भी होती थी। सुप्रसिद्ध वाणभट्ट ने अपने पूर्व पुरुष कुबेर भट्ट का परिचय देते हुए गर्व से लिखा है कि उनके गृह के शुकों एवं सारिकाओं ने समस्त वांग्मय का अभ्यास कर लिया था और यजुर्वेद एवं सामवेद का पाठ करते समय पद पद पर ये पक्षी विद्यार्थियों की गलतियां पकड़ा करते थे। कालांतर में तो शुक इतने प्रबुद्ध हो गए कि शास्त्रार्थ तक करने लगे। शास्त्रार्थ-दिग्विजय के लिए निकले आचार्य शंकर ने पनिहारिनों से मंडन मिश्र का घर पूछा तो उन्होंने यही तो कहा था—
स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं कीरांगना यत्र गिरो गिरन्ति।
द्वारस्थ नीडान्तर सन्निरुद्धः जानाहितं मण्डन मिश्र धामम्॥
मुक्तेश्वर मंदिर समूह भुबनेश्वर में लेखक 
राष्टकवि दिनकर ने कहा था कि पक्षी और बादल। ये भगवान के डाकिये हैं। जो एक महादेश से। दूसरे महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं। मगर उनकी लाई चिट्ठियां/पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बांचते हैं। प्राचीन काल से लेकर अद्यतन पक्षियों एवं मनुष्य का साथ बना रहा और पक्षियों के माध्यम से मनुष्य ने अपनी वाणी को विस्तार दिया। इन पक्षियों ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के कारण साहित्य एवं शिल्प में महत्वपूर्ण स्थान भी पाया। प्रकृति के साथ जुड़े मनुष्यों का भविष्य में भी इनसे साथ बना रहेगा। इति शुक सारिका प्रकरणम्।