बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

जानिए क्यों मनाई जाती है छोटी दीवाली

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहा जाता है। नरक चतुर्दशी को 'छोटी दीपावली' भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त इस चतुर्दशी को 'नरक चौदस', 'रूप चौदस', 'रूप चतुर्दशी', 'नर्क चतुर्दशी' या 'नरका पूजा' के नाम से भी जाना जाता है। 

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी के दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है। दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के दिन संध्या के पश्चात दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं। 

इस चतुर्दशी का पूजन कर अकाल मृत्यु से मुक्ति तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यमराज जी की पूजा व उपासना की जाती है।

शास्त्रों के अनुसार दस दिशाएं मानी गई है, जिसमें सभी दिशाओं के रक्षक दिग्पाल कह्रे जाते हैं। ऊर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारूत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत के रक्षक होते हैं। 

प्राचीन काल में इन दिग्पालों की स्थापना मंदिरों की भित्तियों में इनकी दिशाओं के अनुसार की जाती है। चित्र में भुवनेश्वर के राजा रानी मंदिर में स्थापित यम दिखाई दे रहे हैं।

एक कथा के अनुसार रन्तिदेव नामक एक राजा हुए थे। वह बहुत ही पुण्यात्मा और धर्मात्मा पुरूष थे। सदैव धर्म, कर्म के कार्यों में लगे रहते थे। जब उनका अंतिम समय आया तो यमराज के दूत उन्हें लेने के लिए आये। 
वे दूत राजा को नरक में ले जाने के लिए आगे बढ़े। यमदूतों को देख कर राजा आश्चर्य चकित हो गये और उन्होंने पूछा- "मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया है तो फिर आप लोग मुझे नर्क में क्यों भेज रहे हैं। कृपा कर मुझे मेरा अपराध बताइये, कि किस कारण मुझे नरक का भागी होना पड़ रहा ह।". राजा की करूणा भरी वाणी सुनकर यमदूतों ने कहा- "हे राजन एक बार तुम्हारे द्वार से एक ब्राह्मण भूखा ही लौट गया था, जिस कारण तुम्हें नरक जाना पड़ रहा है।

राजा ने यमदूतों से विनती करते हुए कहा कि वह उसे एक वर्ष का और समय देने की कृपा करें। राजा का कथन सुनकर यमदूत विचार करने लगे और राजा को एक वर्ष की आयु प्रदान कर वे चले गये। यमदूतों के जाने के बाद राजा इस समस्या के निदान के लिए ऋषियों के पास गया और उन्हें समस्त वृत्तांत बताया। 

ऋषि राजा से कहते हैं कि यदि राजन कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करे और ब्राह्मणों को भोजन कराये और उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करे तो वह पाप से मुक्त हो सकता है। ऋषियों के कथन के अनुसार राजा कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करता है। इस प्रकार वह पाप से मुक्त होकर भगवान विष्णु के वैकुण्ठ धाम को पाता है। 

एक अन्य प्रसंगानुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक माह में कृष्ण चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध करके देवताओं व ऋषियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलवाई थी। इसके साथ ही कृष्ण भगवान ने सोलह हज़ार कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त करवाया। इसी उपलक्ष्य में नगरवासियों ने नगर को दीपों से प्रकाशित किया और उत्सव मनाया। तभी से नरक चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाने लगा।

एक अन्य कथानुसार भगवान राम के भक्त महावीर हनुमान जी का जन्म आज के ही दिन हुआ था। हनुमान जी को रूद्र के अवतारों में से एक माना जाता है। 

भगवान राम त्रेतायुग में धर्म की स्थापना करके पृथ्वी से अपने लोक बैकुण्ठ चले गये। लेकिन भगवान राम ने धर्म की रक्षा के लिए प्रलय काल तक हनुमान को पृथ्वी पर रहने का आग्रह किया। इसके लिए राम ने हनुमान ही को अमरता का वरदान दिया। 

बुधवार, 5 जुलाई 2017

प्राचीन काल के प्रतिमा शिल्प में आभूषण अलंकरण

स्त्री एवं पुरुष दोनों प्राचीन काल से ही सौंदर्य के प्रति सजग रहे हैं। स्त्री सौंदर्य अभिवृद्धि के लिए सोलह शृंगार की मान्यता संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक चली आ रही है। कवियों ने अपनी कविताओं में नायिका के सोलह शृंगार का प्रमुखता से वर्णन किया है तो शिल्पकार भी क्यों पीछे रहते, उन्होंने भी प्रतिमा शिल्प में सौंदर्य वृद्धि की सभी युक्तियों को कुशलता के साथ उकेरा है। मंदिरों की भित्तियों में स्थापित जब हम प्रतिमा शिल्प को देखते हैं तो नख-शिख अलकंरण दिखाई देता है, जिसमें वस्त्राभूषण अलंकरण प्रमुखता से उकेरे गए हैं।
पायल धारिणी (राजा रानी मंदिर भुवनेश्वर उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
गुप्तकाल से मंदिर शिल्प योजना में भित्तियों में प्रतिमा शिल्प का प्रयोग दिखाई देता है। इसके पश्चात के काल में प्रतिमा शिल्प के अलंकरण में भिन्नता स्पष्ट दिखाई देती है। वस्त्रों के छापे, पहने का ढंग एवं आभूषणों की बनावट भी पृथक दिखाई देती है। इन प्रतिमाओं में हम देखते हैं कि पुरुष सौंदर्य की वृद्धि के लिए केश विन्यास, वस्त्र, माला, बाजूबंद पहने दिखाई देते हैं। जबकि स्त्रियों के आभूषण अलग दिखाई देते हैं। जिस तरह वर्तमान काल में वस्त्रों एवं आभूषणों में बदलाव फ़ैशन के आधार पर होता है उसी तरह प्राचीन काल में बदलाव दिखाई देता है। 
संध्या काल ( सूर्य मंदिर कोणार्क उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
लगभग तीस वर्षों के भ्रमण काल में मैने विभिन्न कालों में निर्मित मंदिरों के स्थापत्य एवं प्रतिमा शिल्प को देखा है। आप प्रतिमा अलंकरण को देखकर उसके निर्माण काल का अंदाजा लगा सकते हैं। आभूषण (आभरण) प्राचीन काल से ही अलंकरण का साधन रहे हैं। भारत के निवासी प्राचीन काल से आभूषन प्रिय रहे हैं जो आभूषण केश से लेकर पैरों तक धारण करते थे। केशों में चिमटी, माथे पर बेन्दा, कानों में कुंडल, गले में हार, बाजू पर बाजूबंद, कलाई में चूड़ी, कमर में कमरधनी, उंगली में अंगूठी एवं पैरों में पायल का अलंकरण होता था। वर्तमान में इन आभूषणों का प्रयोग उसी रुप में विद्यमान है।
संध्या काल ( शिवालय देवर बीजा, जिला बेमेतरा छत्तीसगढ़) फ़ोटो ललित शर्मा
प्रतिमाओं के शीर्ष पर कीरीट मुकुट दिखाई देता है। स्त्री एवं पुरुष कानों को समान रुप से विभूषित करते थे। तत्कालीन साहित्य में कुंडल एवं कर्णिका का वर्णन होता है। विविध धातुओं से निर्मित रत्नकर्णिका, दारुकर्णिका, त्रपुकर्णिका कहलाती थी। इसके अतिरिक्त आमुक्तिका आभूषण का उल्लेख मिलता है। इसमें कुंडल, आधुनिक झुमके, कर्णिका, बाली एवं आमुक्तिका को टॉप्स माना जा सकता है। घोंघे की खोल जैसे टॉप्स वर्तमान में भी दिखाई देते हैं।
नर्तकी (गणेश मंदिर हम्पी कर्नाटक) फ़ोटो ललित शर्मा
समकालीन साहित्य में कंठ में पहने जाने वाले विभिन्न प्रकार के हारों का उल्लेख है।  जिसमें सुवर्ण सूत्र, कंठ सूत्र, अर्ध हार, हार के साथ मुक्ता हारों में नील मुक्ताहार, लोहित मुक्ताहार एवं श्वेत मुक्ताहार तथा विभिन्न धातुओं से निर्मित रत्नहार, रुचक हार, हिरण्यहार, सुवर्णहार, दंतहार, काषार्पण हार चन्द्रहार प्रमुख हैं, इसके परवर्ती राजपूत काल में नौलखा हार की खूब धूम रही। कंठ आभूषणों में वनमाला का उल्लेख भी आवश्यक है। अधिकतर विष्णु की मूर्ति में वनमाला का अंकन मिलता है। बाजू में धारण करने वाले आभूषण वलय, केयूर एवं अंगद नाम से जाने गए। वलय हाथीदांत से युक्त होता था, केयूर स्वर्ण से बनता था तथा अंगद स्वर्ण एवं रजत के तारों से बनाया जाता था। 
कलश धारिणी देवी (जराय का मठ बरुआ सागर उत्तर प्रदेश) फ़ोटो ललित शर्मा
चूड़ियों को कटक वलय यादि कहा जाता था, इन्हें विभिन्न धातुओं से एवं आकारों में बनाया जाता था। अंगुली में पहने के लिए अंगुलिमुद्रा एवं मुद्रिका या अंगुलीयक होती थी। कई प्रतिमाओं में तो कई अंगुलियों में अंगूठी धारण किए हुए दिखाया गया है। इसके साथ ही मेखला कमर का आभूषण था इसे स्त्रियाँ धारण करती थी, यह रत्न एवं ताम्रयुक्त होती थी। इसे करधनी, किंकणी, कटक, सुवर्णसूत्र, रशना, कांची मेखला आदि कहा जाता है। घुंघरुयुक्त बजने वाली करधनी को कांचीगुण कहा गया है। पैरों में पैजनी, पायल इत्यादि धारण की जाती थी, यह लघुघंटिकायुक्त रजत एवं कांसे से निर्मित की जाती थी। 
नदी देवी गंगा ( देऊर मंदिर मल्हार जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़) फ़ोटो ललित शर्मा
प्रतिमा शिल्प में अप्सराओं, नायिकाओं एवं देवियों को भिन्न भिन्न तरह के आभूषणों से अलंकृत किया जाता था तथा उनके अनुचरों, परिचारको एवं परिचारिकाओं के शरीर पर आभूषण कम दिखाई देते हैं। उस काल में भी बड़े लोग स्वर्ण, रजत एवं बहुमुल्य रत्न जड़ित आभूषणों का प्रयोग करते थे। जिनके पास (दास दासियाँ) अधिक धन नहीं होता था वे रजत, कांसे एवं तांबे के आभूषण धारण करते थे। वर्तमान में यही परिपाटी दिखाई देती है। आभूषण हमेशा उच्चकुल एवं धनवानों के ही होते हैं।
शाल भंजिका ( मुक्तेशर मंदिर समूह भुवनेश्वर उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
आभूषणों का महत्व सौंदर्य वृद्धि के साथ धार्मिक भी है, जिस प्रकार विवाहित स्त्रियां बेन्दा (टीका) धारण करती हैं, कुछ स्थानों पर मंगलसूत्र विवाहित एवं सौभाग्य का सूचक माना गया है। इसी तरह पुरुष भी ताबीज इत्यादि धारण करते थे। उत्खनन के दौराण अर्ध मूल्यवान रत्न अधिक प्राप्त होते हैं, जिनका आभूषणों में प्रयोग किया जाता था। स्वर्ण एवं रजत के आभूषणों में पत्थर भी जड़े जाते थे, जिन्हें रत्न कहा जाता है। गोमेद, जम्बुमणि, स्फ़टिक, सेलखड़ी, हाथी दांत, शीशा आदि जड़े जाते थे। इसके अतिरिक्त मिट्टी के मनके भी धारण किए जाते थे। 
चंवर धारिणी ( विट्ठल मंदिर हम्पी कर्नाटक) फ़ोटो ललित शर्मा
उपरोक्त आलेख के लिए मैने भारत के चारों ओर के विभिन्न मंदिरों की भित्तियों में जड़ित प्रतिमाओं के चित्रों को जुटाया है। इनमे एक चीज समान है, वह है कि किसी भी प्रतिमा की नाक में छिद्र नहीं है अर्थात प्राचीन काल में नाक में नथ, कील, लौंगादि आभूषण धारण नहीं किए जाते थे। कुछ विद्वानों का मत है कि कुषाण काल तक की प्रतिमाओं में नाक का आभूषण प्राप्त नहीं होता। मेरे द्वारा खींचे गए चित्रों में आठवीं शताब्दी से लेकर चौदहवी एवं पन्द्रहवी शताब्दी तक की प्रतिमाएँ जुटाई गई है। जिसमें किसी ने भी नाक का आभूषण नहीं पहना है।
क्षीर सागर में शेष शैया पर भगवान विष्णु एवं देवी लक्ष्मी (लक्ष्मीनारायण मंदिर ओरछा) फ़ोटो ललित शर्मा
अब प्रश्न यह उठता है कि महिलाओं द्वारा नाक में आभूषण कब से पहने जाने लगा। इसका जवाब भी मंदिरों से प्राप्त होता है। जब मैं ओरछा भ्रमण कर रहा था तब लक्ष्मीनारायण मंदिर की भित्तियों पर अठारवीं शताब्दी की भित्ति चित्रकारी दिखाई थी। इस चित्रकारी में रामायण के प्रसंगों से लेकर अंग्रेजों के साथ युद्ध तक को प्रदर्शित किया गया है। इन भित्ति चित्रों में कृष्ण राधा के उपवन विहार का प्रसंग भी दिखाई देता है, इस चित्र में सभी महिलाओं ने नाक में नथ पहन रखी है। शेष शैया पर विश्राम करते विष्णु के चित्र में भी लक्ष्मी की नाक में नथ पहनाई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि नाक में आभूषण पहनने की परम्परा मुगल काल में प्रारंभ हुई और अद्यतन जारी है।    

शनिवार, 1 जुलाई 2017

मानव का पक्षी प्रेम एवं शुक सारिका प्रसंग


क्षियों से मनुष्य का जन्म जन्मानंतर का लगाव रहा है। पक्षियों का सानिध्य मनुष्य को मन की शांति प्रदान करता है तो बहुत कुछ सीखने को उद्यत करता है। कुछ पक्षी तो ऐसे हैं जो मनुष्य से उसकी बोली में बात करते हैं और इन्होंने सामान्य नागरिक के गृह से लेकर राजा महाराजाओं के महलों के अंत:पुर एवं ॠषियों की कुटियों में भी स्थान पाया है। शुक एवं काग ऐसे पक्षी हैं, जो ॠषियों के सानिध्य में ज्ञानार्जन कर शुकदेव एवं कागभुसुण्डि के नाम से लोक में प्रतिष्ठित हुए। शुक के सम्बंध में एक धारणा यह भी है कि वह बहुत बुद्धिमान होता है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार शुक ने शिवजी का समस्त ज्ञान श्रवण द्वारा आत्मसात कर लिया था। वही अध्यात्म-पारंगत शुकदेव रूप में अवतरित हुआ।  इतिहास आलेख  शुक सारिका 
शुक सारिका खजुराहो 
विरहणी के एकांत के संगी के रुप में तोता-मैना लोक प्रसिद्ध हैं। अंत:पुर की विरह व्याकुल रमणी के द्वारा इन पक्षियों के संवाद से संस्कृत साहित्य भरा पड़ा है। तोता-मैना का लोक प्रसिद्ध कहानी एवं संवाद एक समय में यह युवा एवं युवती के मुंह से सुना जा सकता था। शुक-सारिका को लेकर बहुत ही कथाएं प्रचलित हैं, इन्हीं का लोक कथाओं में रूपान्तर ‘किस्सा तोता-मैना’ के नाम से हुआ जिसके विविध संस्करण बाजार में उपलब्ध हैं। ये दोनो पक्षी मनुष्य की बोली में बोलने की क्षमता के कारण प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान तक मनुष्य के साथी बने हुए हैं।

ऐसे में ये पक्षी शिल्पकार की दृष्टि से कैसे ओझल हो सकते थे। तोता-मैना को शिल्पकारों में अपने शिल्प में शुकसारिका के रुप में स्थान दिया। प्राचीन मंदिर स्थापत्य में शुकसारिका का शिल्पांकन प्रमुखता से दिखाई देता है। शिल्पकारों ने शुकसारिका को अपने शिल्प का विषय बनाया, जिससे युगों युगों तक पक्षी एवं मनुष्य के सानिध्य, प्रेम एवं सहवास को आने वाली पीढियाँ जान सकें। मुझे भारत में आठवीं नवमी शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी तक के स्थापत्य में शुक सारिका का शिल्पांकन दिखाई देता है। ऐसे में शुक सारिका के शिल्पांकन से खजुराहो के मंदिर कैसे अछूते रह सकते हैं। जहाँ कामसूत्र का शिल्पांकन हो वहाँ शुक सारिका का शिल्पांकन अवश्य मिलता है क्योंकि कामसूत्र में शुक सारिकाओं के साथ आलाप करने कराना की क्रिया को चौसठ कलाओं में गिना गया है।
लोक में तोता ही एक ऐसा पक्षी एवं जीव है जो मनुष्य की वाणी का अनुकरण कर सकता है। इसे बोलना सिखाना पड़ता है या यह किसी भी बोलते हुए मनुष्य का अनुकरण कर रटता है, परन्तु मैना स्वत: बोलती है। बस्तर की पहाड़ी मैना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी आवाज में बात करके अचंभित कर दिया था। शुक सारिका लोक प्रसिद्ध हैं, शुक ख्याति तो ऐसी है कि इसे पालने वाले सबसे पहले राम राम, सीता राम बोलना सिखाना है। किसी के घर के शुक की वाणी सुनकर उस परिवार के आचार विहार का आंकलन किया जा सकता है कि परिवार कितना सुसंस्कृत एवं सभ्य है। 
मुक्तेश्वर मंदिर समूह भुबनेश्वर की शुक सारिका 
साहित्य में शुक ने प्रमुख स्थान पाया है, इसकी उपस्थित संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक प्राप्त होती है। जायसी के ‘पद्मावत’ में तोते को गुरु और मार्गदर्शक का पद प्राप्त है। ‘हीरामन’ नाम से वह रत्नसेन और पद्मावती को परामर्श भी देता है और उनके मिलन में सहायक भी होता है। रचना के अन्त में उसके बारे में स्पष्ट लिखा है—सूआ सोई जे पंथ दिखावा। बिनु गुरु जगत को निर्गण पावा।
मुंशी प्रेमचंद की कहानी आत्माराम में वेदीग्राम का सुनार महादेव तोते के साथ अपने एकाकीपन को बांट लेता है। तो प्राचीनकाल के अंत:पुर की रमणियाँ भी शुक के साथ संवाद कर अपने एकाकीपन को दूर करती थी। छत्तीसगढ़ के लोकगीतों में सुआ प्रमुख स्थान रखता है। यहाँ यह विरहणी का संवदिया बनता है और सुआ गीत एवं सुआ नृत्य के रुप में लोक में स्थापित एवं प्रतिष्ठित हो जाता है। 
तोते की चोंच (शुक चंचू) जैसी किंचित टेढ़ी नासिका सौंदर्य का प्रतीक बनती है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की शुकनासिका और बिम्ब अधरों का बहुत ही आकर्षक चित्र खींचा है। एक तोते को उर्मिला के नाक के मोती पर होंठों की कान्ति पडऩे के कारण अनार के दाने की भ्रान्ति हुई। फिर नाक को देखकर सोचता है यह दूसरा तोता कहां से आ गयाकवियों ने तोते का अनेक रूपों में चित्रण किया है। बड़े शौक से पाला हुआ तोता भी कभी उपेक्षा का शिकार हो जाता है और काले कौवों को सम्मान मिलता है। बिहारी ने अन्योक्ति के रूप में इसका चित्रण किया है।
मरत प्यास पिंजरा पर्यो सुआ समै के फेर।
आदर दै दै बोलियत वाईसु बलि के बेर॥
शुक-सारिका तो अनादिकाल से ही घरों एवं आश्रमों की शोभा बढ़ाते रहे हैं। जगज्जनी जानकी की विदा के समय उनके द्वारा पाले हुए ये पक्षी इतने दुःखी हुए कि इन्होंने परिजनों को भी अधीर कर दिया—
सुक सारिका जानकी ज्याये। कनक पिंजरन्ह राखि पढ़ाये॥
व्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुवि धीरजु परिहरह न केही॥
शुक सारिकाएँ राज महलों या किसी विलासी नागरिक के बहिर्द्वार तक ही नहीं मिलती थी इनकी उपस्थिति तपोवन में ॠषि निवासों में भी होती थी। सुप्रसिद्ध वाणभट्ट ने अपने पूर्व पुरुष कुबेर भट्ट का परिचय देते हुए गर्व से लिखा है कि उनके गृह के शुकों एवं सारिकाओं ने समस्त वांग्मय का अभ्यास कर लिया था और यजुर्वेद एवं सामवेद का पाठ करते समय पद पद पर ये पक्षी विद्यार्थियों की गलतियां पकड़ा करते थे। कालांतर में तो शुक इतने प्रबुद्ध हो गए कि शास्त्रार्थ तक करने लगे। शास्त्रार्थ-दिग्विजय के लिए निकले आचार्य शंकर ने पनिहारिनों से मंडन मिश्र का घर पूछा तो उन्होंने यही तो कहा था—
स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं कीरांगना यत्र गिरो गिरन्ति।
द्वारस्थ नीडान्तर सन्निरुद्धः जानाहितं मण्डन मिश्र धामम्॥
मुक्तेश्वर मंदिर समूह भुबनेश्वर में लेखक 
राष्टकवि दिनकर ने कहा था कि पक्षी और बादल। ये भगवान के डाकिये हैं। जो एक महादेश से। दूसरे महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं। मगर उनकी लाई चिट्ठियां/पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बांचते हैं। प्राचीन काल से लेकर अद्यतन पक्षियों एवं मनुष्य का साथ बना रहा और पक्षियों के माध्यम से मनुष्य ने अपनी वाणी को विस्तार दिया। इन पक्षियों ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के कारण साहित्य एवं शिल्प में महत्वपूर्ण स्थान भी पाया। प्रकृति के साथ जुड़े मनुष्यों का भविष्य में भी इनसे साथ बना रहेगा। इति शुक सारिका प्रकरणम्।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

नवीन मित्रों की वैवाहिक वर्षगांठ पार्टी : सुंदरबन यात्रा

दिन भर की सुंदरबन सफ़ारी के बाद हमारा स्टीमर जेट्टी से आ लगा, आज विशेष दिन भी था। कोलकाता से आए हमारे नए साथी नबारुन दत्ता एवं श्री दत्ता की वैवाहिक वर्षगांठ भी थी, इन्होंने हम सभी को इस खुशी के अवसर पर सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया था कुछ स्नेक्स एवं बेवरीज का इंतजाम भी अपनी तरफ़ से शक्ति के अनुसार किया था। हमारा भी फ़र्ज बनता था कि हम किसी की खुशी में सम्मिलित हों।
नबारून और श्री टाइटैनिक पोज 
रिसोर्ट में पहुंचकर पार्टी सजाई गई, थ्री चीयर्स के साथ शुभकामनाएं की बौछार सभी मित्रों ने दोनों पर की। कुछ गाने गए और कुछ नृत्य का मजा लिया गया। इस तरह पार्टी में रौकन आ गई। इसे ही कहते है कि मनुष्य किसी भी स्थान पर किसी भी परिस्थिति में रहे वह आनन्द का अवसर ढूंढ ही लेता है। हमारे प्रवीण सिंह ने इस अवसर को खूब इनज्वाय किया। इस तरह सभी ने मिलकर इस जोड़े की सालगिरह को अविस्मरणीय बना दिया।
झारखाली  जेट्टी 
अगले दिन हमें लौटना था इसलिए रात्रि विश्राम हुआ,  सुबह उठकर आस पास का जायजा लिया गया। हमारी गारी कोलकाता से दोपहर तक आनी थी, इसलिए दोपहर के भोजन के उपरांत हम कोलकाता के लिए चल पड़े। अब हमें पुन; चार घन्टे का सफ़र तय करके गोड़खाली एवं कैनिंग होते हुए कोलकाता पहुंचना था। वहाँ हमारे ग्रुप घुमक्कड़ी दिल से के सुपर एडमिन किशन बाहेती जी प्रतीक्षा कर रहे थे।
झारखाली  की सुबह 
टैक्सी वाले हमको हावड़ा स्टेशन छोड़ दिया, हमारी ट्रेन रात को दस बजे थी, तब तक कोलकाता घूमने के लिए हमारे पास समय था। लेकिन सबसे बड़ी समस्या सामान रखकर खाली हाथ घूमने की थी। अनिल रावत किसी की शादी में सम्मिलित होने चले गए, मैं, राजु दास, ज्ञानेन्द्र पाण्डेय आदि किसन जी के साथ उबेर लेकर कोलकाता का चक्कर लगाने निकल पड़े। रास्ते में तय हुआ कि इतना अधिक समय नहीं है कि हम कुछ देख सकें।

स्ट्रीट फ़ूड का मजा किशन जी, राजू, ज्ञानेंद्र पाण्डेय 
मैने कहा कि आज कोलकाता के स्ट्रीट फ़ुड का आनंद लिया जाए, बस फ़िर क्या था, किशन जी हमको पार्क स्ट्रीट ले गए और वहाँ हमने झालमुड़ी से स्वाद लेना प्रारंभ किया, फ़िर पनीर रोल खाते हुए एक स्थान पर पकोड़ी और चीला खाने पहुंचे। यहाँ पहुंचने पर ज्ञानेन्द्र भाई ने अपना बैग ठेले वाले पास रख दिया और हम पकोड़ी खाने लगे। तभी मेरे घूमने से बैग उसकी गरम तेल की कहाड़ी से भिड़ गया और कड़ाही उलटने से सारा गरम तेल बैग पर गिर गया।
लस्सी सेवन - प्यार बांटते चलो 
इस दुर्घटना से मेरा दिमागी संतुलन क्षणिक बिगड़ गया, अगर वह गरम तेल किसी व्यक्ति पर गिर जाता तो बहुत बड़ी दुर्घटना घट सकती थी। बैग पर तेल गिरने से खाने का मन भी नहीं रहा। पहले बैग का तेल झाड़ा गया और एक बैग का निकाल कर उसे फ़ेका गया। यहाँ से चलकर लस्सी चाय पी और अंतिम में मटका कुल्फ़ी खाकर हम स्टेशन लौट आए। गाड़ी प्लेटफ़ार्म पर लग चुकी थी, जब गाड़ी चलने को हुई तो अनिल रावत भी दौड़ कर पहुंचे… गाड़ी चल पड़ी और हमारी सुंदरबन सफ़ारी सम्पन्न हो चुकी थी………

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

विशाल जलराशि के बीच स्टीमर में सफ़ारी : सुंदरबन यात्रा

स्टीमर में सवार होकर सुंदरबन के डेल्टा की अथाह जलराशि के बीच हम आगे बढ रहे थे, कैमरे अभी भी सजग ही थे, न जाने कब कहाँ और क्या मिल जाए, इसलिए फ़ोटोग्राफ़र को हमेशा सजग मोड में रहना पड़ता है सफ़ारी के दौरान। कभी तो ऐसा होता है कि जैसे ही पैकअप किया और वह जानवर सामने आ जाता है जिसके लिए हमने सफ़ारी की थी और कैमरा चालु करते तक वह आँखों से ओझल हो जाता है।
हमारे सुपर फोटोग्राफर प्राण चड्डा जी 
हम सुंदरबन बाघ देखने आए थे, परन्तु बाघ दिख नहीं था तो प्राकृतिक दृश्यों, चिड़ियों की फ़ोटोग्राफ़ी हो रही थी। संजेखाली वाच टावर से हम सुधन्याखाली वाच टावर पहुंचे। जैसे ही हम पहुँचे तो लगभग 200 फुट की दूरी पर काली चट्टान के जैसे कुछ दिख रहा था। मैंने तीन चित्र लिए। तीसरा चित्र लेने के बाद जब यह काली चट्टान उड़कर वृक्ष पर बैठ गयी तब समझ आया कि यह पक्षी है। 
Changeable hawk Eagle
यह काफ़ी Changeable hawk Eagle बड़ा पक्षी था, इसकी ऊंचाई लगभग ढाई फुट होगी और सामान्य ईगल से काफी बड़ा था। यह मान सकते हैं कि ईमू से थोड़ा छोटा होगा। फोटो लेते वक्त यह तालाब में स्नान कर रहा था। यह सद्यस्नात का चित्र है। खुशी कि बात यह है कि मेरे कैमरे में दुर्लभ पक्षी पकड़ में आया।

वन देवी 
इस द्वीप के निवासी बाघ एवं जंगली जानवरों से बचने के लिए वन देवी की पूजा करते हैं और फ़िर समुद्र में उतरते हैं। जिससे मन में कोई दुर्घटना घटने की आशंका नहीं रहती। इस वाच टावर में सुंदरबन में होने वाले कई तरह के पेड़ पौधों की प्रजातियों को प्रदर्शित किया गया है।
स्टीमर टाइगर 
यहाँ लोहे का बना टायगर नामक ब्रिटिशकालीन छोटा जहाज भी ग्राऊंड किया हुआ है। जो अपनी सेवा से निवृत्त होकर जंग खाते पड़ा है। एक अरसे के बाद जंग एवं खारा पानी इसे खत्म कर देगा। यहाँ कोई जानवर देखने नहीं मिला।
जंगली सूअर 
यहाँ से अगले टावर की ओर हम बढ़ गए, रास्ते में खाना खाया, जिसमें दाल भात, चोखा, चिंगरी माछ इत्यादि का सम्मिलित था। आगे बढते हुए एक स्थान पर जंगली सुअर दिखाई दिए, थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर चीतल भी। फ़िर आगे चलकर एक स्थान पर दलदल में बाघ के पद चिन्ह दिखे। जिससे लग रहा था कि बाघ जलराशि को लांघकर दूसरे जंगल की ओर गया है। चलो हम इतने से ही संतुष्ट हो गए कि बाघ नहीं तो बाघ के पद चिन्ह तो दिखे। 
वाच टावर 
आगे चलकर हमारा स्टीमर अंतिम पड़ाव दोबांकी कैम्प वाच टावर पहुंचा। यहाँ वाच टावर पर पहुंचने पर एक बड़ी गोह वृक्ष के नीचे धूप सेकते हुए दिखाई दी। सुंदरबन में गोह बड़ी संख्या हैं, हमें यह कई स्थानों पर दिखाई दी। ये गोह काफ़ी बड़ी थी। पूंछ से सिर तक की लम्बाई सात फ़ुट से अधिक रही होगी। इनका शरीर छिपकली के जैसा होता है, परन्तु उससे काफ़ी बड़ा होता है।
गोह 
गोह छिपकिलियों की निकट संबंधी हैं, जो अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, अरब और एशिया आदि देशों में फैले हुए हैं। ये छोटे बड़े सभी तरह के होेती है, जिनमें से कुछ की लंबाई तो 10 फुट तक पहुँच जाती है। रंग प्राय: भूरा रहता है, शरीर छोटे छोटे शल्कों से भरा रहता है। जबान साँप की तरह दुफंकी, पंजे मजबूत, दुम चपटी और शरीर गोल रहता है। इनमें कुछ अपना अधिक समय पानी में बिताते हैं और कुछ खुश्की पर, लेकिन वैसे सभी गोह खुश्की, पानी और पेड़ों पर रह लेते हैं। ये सब मांसाहारी जीव हैं, जो मांस मछलियों के अलावा कीड़े मकोड़े और अंडे खाते है।
गोह 
गोह पानी में रहती है। तराकी में दक्ष है यह, साथ में तेज धावक व वृक्ष पर चढने में माहिर होती है। पुराने समय में जो काम हाथी-घोडे नहीं कर पाते थे, उसे गोह आसानी से कर देती थी। इनकी कमर में रसा बाँधकर दीवार पर फेंक दिया जाता था और जब ये अपने पंजों से जमकर दीवार पकड लेती थी, तब सैनिक रस्सी के सहारे ऊपर चढ जाते थे। हमने गोह की फ़ोटो ली। तब तक सांझ ढलने लगी थी एवं जानवरों के जलस्रोतों की ओर लौटने का समय हो गया था।
चीतल हिरण 
वाच टावर से दिखने वाले टैंक पर एक नर चीतल का आगमन हुआ, सभी अपने कैमरे से फ़ोटो लेने लगे। मुझे पता था कि नर चीतल हालात का जायजा लेने आया है, सब कुछ सही मिलने पर दल के बाकी सदस्य भी पहुंचने वाले हैं। थोड़ी देर बाद मादा चीतल एवं उसके शावक भी पानी पीने के लिए पहुंचे, हमने जी भर के फ़ोटो खींचे। इसके बाद वापस स्टीमर में आ गए। सांझ हो रही थी सूरज ढल रहा था। हमारा स्टीमर वापसी की राह पर था।
लौटते हुए राजू दास मानिकपुरी 
एक स्थान पर खारे पानी का मगरमच्छ विश्राम करते दिखाई दिया। स्टीमर उसकी तरफ़ मोड़ कर ले जाया गया जिससे हम उसकी फ़ोटो ले सकें।  कुछ जंगली सुअर भी दलदल में विचरण करते दिखाई दिए। परपल हेरोन, ग्रेट इगरेट इत्यादि पक्षियों के साथ तोते भी उड़ान भर रहे थे। मछली मारने वाली, शहद बटोरने वाली नौकाएं भी लौट रही थी। सुंदरबन के जंगलों से स्थानीय निवासी प्रतिवर्ष लगभग 10 हजार टन शहद निकालते हैं। जब सूरज अस्ताचल की ओर जाता है, सारा जगत अपना काम खत्म करके विश्राम के मुड में होता है और हम भी अपनी जेट्टी की तरफ़ जा रहे थे। जारी है ..... आगे पढ़ें 

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

टीम चायना गेट मिशन सुंदरबन पर : सुंदरबन यात्रा

सुबह मेरे उठने से पहले ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, प्रवीण सिंह, प्राण चड्डा जी रिसोर्ट के आस पास फ़ोटो खींचने चले गए। गाँव वालों ने बताया कि चार दिन पहले बाघ उनके गाँव तक आ गया था। कभी कभी बाघ बफ़र जोन में भी आ जाते हैं इसलिए गांव से दूर सावधानी के साथ जाना चाहिए। वैसे दूर जाने के मनाही भी है।  
तीन पहिया जुगाड़ में जेट्टी की ओर 
सुबह हम तैयार होकर सफ़ारी के लिए तीनगोड़िया फ़टफ़टिया में बैठकर जेट्टी की ओर चल पड़े। जेट्टी पर हमारा स्टीमर प्रतीक्षा कर रहा था। यह दो मंजिला बड़ा स्टीमर था, जिसमें शौचालय के साथ भोजन बनाने की सुविधा भी थी। सोमनाथ दा ने हमारा भोजन जेट्टी पर चढवा दिया साथ ही आरो वाटर की बोतलें भी। इस गाँव का पानी खारा होने के कारण सभी लोग आरो वाटर का प्रयोग करते हैं।
टीम चायना गेट :)
हर हर महादेव के उद्घोष के साथ हमारी सुंदरबन यात्रा प्रारंभ हो गई। हमारे साथ नबारुन दत्ता एवं उनकी पत्नी भी इस सफ़ारी में शामिल हो गए। यहाँ पर हम विद्याधरी नदी से समुद्र की ओर बढ रहे थे। विद्याधरी नदी का पाट बहुत चौड़ा है, इसमें पहुंचने के बाद यही समुद्र सा अहसास करवाती है। 
टीम चायना गेट मिशन पर 
सभी ने बोट में अपना स्थान ग्रहण कर लिया और कैमरा लेकर मुस्तैद हो गए, अभी तो सफ़र शुरु ही हुआ था। परन्तु लग रहा था कि पानी में बहुत दूर आ गए और अभी ही हम लोगों को बाघ दिख जाएगा। जबकि बाघ का कोसों दूर कोई पता नहीं था। प्राण चड्डा जी ने गाईड को कहा कि अगर वो बाघ दिखाएगा तो उसे पाँच सौ रुपए देंगे।
कमांडर ऑफ़ टीम चायना गेट प्राण चड्डा जी 
अचानक प्राण चड्डा जी का मन बोट ड्राइव करने का हो गया और काकपिट से पायलेट को बाहर निकाल खुद ही बोट उड़ाने लगे। खैर हम तो अनुभवी हैं इसलिए कोई खास अंतर नहीं पड़ा परन्तु बोट का असली पायलेट सदमे में आ गया क्या पता फ्लाइट के दौरान पायलेट को बाहर निकाल प्लेन उड़ाने लग जाएं तो सवारियों का क्या होगा? भले ही हमें सफ़ारी बाघ दिखे या न दिखे, परन्तु प्राण चड्डा जी ने बोट चला कर बाघ देखने के इतना रोमांचित तो जरुर कर दिया। जब सफ़र में साथ जिन्दादिल हों तो उसका मजा ही कुछ और है। 
समंदर में स्टीमर 
हम देखते हैं कि डेल्टा क्षेत्र में कई द्वीपों को मिलाकर सुंदरबन का निर्माण प्रकृति ने किया है। मैनग्रोव के वृक्षों से भरे ये द्वीप बंगाल टाइगर की आदर्श शरणस्थली बने हुए हैं। पानी में तैरकर शिकार करने वाले ये बाघ आदमखोर कहे जाते हैं एवं मछली पकड़ने वाली नौकाओं पर हमला करने में भी नहीं चूकते। बड़ा शिकार न मिलने पर ये बाघ मत्स्य आखेटकर भक्षण करने में भी सिद्ध हैं। 
मैंग्रोव जंगल 
सबसे पहले हम सजनेखाली वाच टावर में उतरे। यहाँ तारघेरा लगाकर कुछ मगरमच्छ एवं गोहों (मानिटर लिजार्ड) को रखा गया है। इसके साथ ही एक छोटी सी प्रदर्शनी सुंदरबन के विषय में लगाई गई है। जिससे आने वाले को सुंदरबन की सम्पूर्ण जानकारी मिल सके। 
सजने खली वाच टॉवर 
बंगाल हैडीक्राफ़्ट का छोटा सा विक्रय केन्द्र भी है। मुझे यहां बहुत बड़ी गोह दिखाई दी। इतनी बड़ी गोह मैने नहीं देखी भी। हम लोगों ने कुछ फ़ोटो लिए और फ़िर लौटने का समय हो गया। जेट्टी पर हमारा स्टीमर लग चुका था। स्टीमर में सवार होकर हम आगे बढ गए।
मॉनिटर लिजार्ड - गोह 
सुंदरबन सफ़ारी के दौरान दूर सुनसान किनारे पर दलदल में एक धब्बा सा दिखाई दिया। पहचान में नहीं आ रहा था कि वह मनुष्य है या जानवर। मैने कैमरा जूम करके एक चित्र लिया तब तक बोट आगे बढ गयी और वह धब्बा आँखों से ओझल हो गया। खींची गई फ़ोटो देखने पर पता चला कि वह धब्बा सा एक महिला है। जो उकड़ू बैठकर केकड़े फ़ंसा रही है। 
केकड़े पकड़ती महिला मौत की आहट से बेखबर 
जिस वन में आदमखोर बाघ रहते हैं और वे कब हमला कर दें इसका पता नहीं वहां जान पर खेलकर केकेड़े पकड़ना बहादुरी का नहीं विवशता का कार्य है। इस अंचल के निवासियों का मुख्य व्यवसाय मछली, झींगे, केकड़े आदि पकड़ कर एवं शहद निकालकर जीवन निर्वहन है। आसपास के गाँव के मछुवारे ज्वार भाटे एवं मौसम का ध्यान रखते हुए अपनी नाव लेकर मछली पकड़ने निकल जाते हैं एवं बाघ का शिकार बनते हैं।
 यह भी एक अंदाज है कातिलाना 
गत वर्ष ही कैनिंग के समीप दत्ता झील के किनारे केकड़े पकड़ रहे एक मांझी पर बाघ हमला करके उसे खींच कर जंगल में गायब हो गया। उसके मांझी के साथियों ने बाघ का पीछा किया, लेकिन वह मांझी को अपने जबड़ों में दबाए जंगल में कहीं गायब हो गया एवं उसका शव तक बरामद नहीं हुआ। आखिर पेट की भूख प्राणों पर भारी पड़ ही जाती है परन्तु यह विवशता है कि इनके पास इसके अतिरिक्त जीवन निर्वाह करने के लिए अन्य कोई कार्य भी नहीं है। 
बंगाल का बाघ 
वैज्ञानिकों का मानना है कि पानी में खारे पानी की अधिकता के कारण मैन्ग्रोव की सुंदरी प्रजाति नष्ट होते जा रही है, जिसके कारण हिरणों की संख्या भी कम होने की आशंका जताई जा रही है। जहाँ हिरण कम होंगे तो वहां बाघों के लिए भोजन की समस्या प्रारंभ हो जाएगा और बाघों पर वैसे ही शिकारियों का खतरा मंडराता रहा है.
टाइग्रेस इन एक्शन : श्री दत्ता 
अब यह नई समस्या भी जन्म लेने लगी हैं। मानव एवं बाघ दोनों का बसेरा है सुंदरबन में। दोनों को एक दूसरे के अस्तित्व स्वीकार कर अपना निर्वहन करना है। फ़िर व्यक्ति कितनी भी चतुराई कर ले, जंगली जानवर का शिकार बन ही जाता है। न मानव जंगल छोड़ सकता न बाघ।  जारी है, आगे  पढ़ें  

रविवार, 16 अप्रैल 2017

छत्तीसगढ़ रॉयल टायगर सुंदरबन में : सुंदरबन यात्रा

सुंदरबन एक मैन्ग्रोव का जंगल है, जहाँ के रॉयल बंगाल टायगर प्रसिद्ध हैं। इसका चालिस प्रतिशत भाग हिन्दुस्तान में एवं साठ प्रतिशत भाग बंगलादेश में है। कई वर्षों से सुंदरबन जाने की प्रबल इच्छा थी। पर संयोग वर्ष 2017 के जनवरी के माह के अंतिम सप्ताह में बना।

सुंदरबन के यात्री प्रवीण सिंह, ललित शर्मा, राजुदास, ज्ञानेन्द्रा पाण्डेय, निखिलेश, दिगेश्वर एवं अनिल रावत
इस तरह हम लोगों की टीम सुंदरबन तैयार हो गई, बलौदाबाजार से निखिलेश त्रिवेदी, प्रवीण सिंह, दिनेश ठाकुर, बिलासपुर से प्राण चड्डा, रायपुर से ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, अनिल रावत एवं कवर्धा से राजुदास मानिकपुरी सुंदरबन जाने के लिए तैयार हुए। लिस्ट में कुछ नाम और भी थे परन्तु आकस्मिक कार्यों के कारण वे नहीं जा सके।

विद्यासागर सेतु हावड़ा की सुबह
छब्बीस जनवरी को हम लोग ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस से हावड़ा के लिए रवाना हुए। अगली सुबह हावड़ा में हमारे टूर आपरेटर तैयार सुमंत बसु सारी तैयारियों के साथ मौजूद थे। हम हावड़ा से सात बजे सुंदरबन के लिए चल पड़े। हमारा पहला पड़ाव कनिंग था। इसके बाद हम सुंदरबन के ग्राम झाड़खाली पहुंचे।

प्राण चड्डा जी सुन्दरबन में
यहाँ सोमनाथ दा के होम स्टे रिसोर्ट में हमारा ठहराव था। झाड़खाली वैसे तो छोटी जगह है, परन्तु यहाँ से सुंदरबन के लिए बोट मिलती हैं और जेट्टी भी है। यहाँ से सुंदरबन की सफ़ारी कराई जाती है। दोपहर एक बजे हम नहा धोकर तैयार हुए और भोजन के पश्चात आराम करके झाड़खाली के चिड़ियाघर देखने गए। 
ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, कुछ खरीदा जाए
झाड़खाली में एक चिड़ियाघर बनाया गया है, जिसमें दो रायल बंगला टायगर को रखा गया है। जाली में बंद टायगर की फ़ोटो खींचने में बड़ी तकलीफ़ होती है। दो जालियों के बीच फ़ोकस करके फ़ोटो लेना बहुत ही कठिन काम है। 
अनिल रावत एवं राजुदास मानिकपुरी
जू में बनाई गई नहर में कुछ मगरमच्छ भी छोड़े हुए हैं। हमने इन सबकी फ़ोटोग्राफ़ी की और फ़िर जेट्टी तक घूमने गए। जेट्टी पर कुछ फ़ोटो खींच कर लौट आए। इस दिन हमारे साथ कोलकाता से आया हुआ एक जोड़ा नबारुन दत्ता एवं श्रीदत्ता भी ठहरे हुए थे। दोनो स्वभाव से मिलनसार लगे। इन्होने हम लोगों से दोस्ती गांठ ली।
झाड़खाली जू का मगरमच्छ
रात को हमारे लिए बाऊल नृत्य गान का आयोजन किया गया था। हमने रात को बाऊल नृत्य गान का आनंद लिया। बाऊल नृत्यगान वैष्णव पंथी कृष्ण भक्ति पर आधारित है। धीमे साज पर एकतारा के साथ गाया जाता है तो ऐसा लगता है कि गायक एकदम डूब कर गा रहा है। 
रायल बंगाल टायगर पिंजरे में
सोमनाथ दा ने भोजन में सभी तरह की तैयारी कर रखी थी। जिसमें सामिष एवं निरामिष दोनो भोजन था। होम स्टे में एक फ़ायदा यह होता है कि घरेलू भोजन कराया जाता है, जिसमें नमक, मिर्च एवं तेल की मात्रा सही होती है। अधिक तेल और ग्रेवी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ही हैं। 
तन्मयता से फ़ोटोग्राफ़ी दिनेश ठाकुर
सुंदरबन के आसपास के गाँव के कुछ लोग पर्यटन व्यवसाय से भी जुड़ गये हैं, जिससे कुछ आमदनी हो जाती है अन्यथा मांझी की नाव समुद्र के ज्वार भाटा का आंकलन कर सुरक्षित समय में खाना पानी लेकर मछली मारने निकल जाती है। इनकी नाव में खाना बनाने के लिए चूल्हा भी होता है। जाल डालने के बाद चूल्हे पर माछ भात तैयार कर लेते हैं और दो-चार दिन मछली मारने के लिए दूर तक निकल जाते हैं।
मांझी की नाव एव किनारा
इसे हैरिटेज साइट घोषित करने के कारण बफ़र जोन में भी पक्की छत का मकान बनाना वर्जित है। अधिकांश घरों में फ़ूस के छप्पर दिखाई देते हैं। बांस की खप्पचियों की दीवार बनाकर उसकी दोनो तरफ़ से मिट्टी की छबाई कर दी जाती है एवं फ़ूस की छत की ढलान अधिक होती है जिससे उसमें पानी नहीं ठहरता। मार्च के अंतिम सप्ताह से यहाँ गर्मी प्रारंभ हो जाती है। जो जुलाई अगस्त तक जारी रहती है। ऐसे समय में फ़ूस की छत एवं मिट्टी की दीवारें वाताकूलन का कार्य करती हैं।
सुंदरबन के साथी नबोरुन दत्ता, श्री दत्ता एवं राजुदास मानिकपुरी
घर के भीतर खाना बनाने के लिए चुल्हा, पकाने के चार बर्तनों के साथ चार-छ: बर्तन, बांस का मचान जैसा सोने का जुगाड़ एक नाव एवं मछली पकड़ने का जाल, यही इनकी कुल पूंजी है। फ़ारेस्ट एक्ट प्रभावी होने के कारण यहाँ बिजली नहीं है, बिजली की पूर्ति के लिए यहाँ सौर्य उर्जा का सहारा लिया जाता है। जिससे एक सीएफ़एल जला लेते हैं एवं मोबाईल इत्यादि चार्ज कर लिया जाता है। घरों के आस पास छोटे छोटे तालाब हैं, जिनमें बरसात का मीठा पानी जमा किया जाता है और उनमें मछली पालन किया जाता है। साथ निस्तारी के लिए इस जल का उपयोग किया जाता है। 
रात्रिकालीन आयोजन बाऊल नृत्यगान सभा
पशुओं की संख्या कम ही है, इसलिए गांव में दूध उपलब्ध नहीं हो पाता। बकरियों के अधिक यहाँ कुत्तों की संख्या दिखाई दी। इसको पालने का कारण भी यह है कि हिंसक जानवरों के गाँव की ओर आने की चेतावनी कुत्ते पहले ही दे देते हैं। जिससे ग्रामीण अपने जान माल की सुरक्षा का प्रबंध कर लेते हैं। नहीं तो क्या पता, सुंदरबन के छुट्टे आदमखोर बाघ कब किसका लिल्लाह पढवा दें और बॉडी भी न मिले। बाऊल नृत्य के पश्चत हम भोजन करके सोने चले गए। अगले दिन सुबह नौ बजे से हमें सफ़ारी पर जाना था। जारी है … आगे पढें…

नोट: यह यात्रा 26 जनवरी 2017 से 30 जनवरी 2017 के बीच की गई।